हिमाचल प्रदेश की दर्शनीय स्थल और हिमाचल प्रदेश की महत्वपूर्ण जानकारी

Shimla - Manali

Shimla – Manali

हिमाचल प्रदेश की महत्वपूर्ण जानकारी

हिमाचल प्रदेश पश्चिमी भारत में स्थित राज्य है। यह उत्तर में जम्मू और कश्मीर, पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम में दक्षिण में हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में उत्तराखंड तथा पूर्व में तिब्बत से घिरा है। ‘हिमाचल’ प्रदेश का शाब्दिक अर्थ बर्फ़ीले पहाड़ों का अंचल’ है। हिमाचल प्रदेश को देव भूमि भी कहा जाता है। हिमाचल प्रदेश में आर्यों का प्रभाव ऋग्वेद से भी पुराना है। आंग्ल-गोरखा युद्ध के बाद, यह ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आ गया। सन् 1857 तक यह पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के शासन के अधीन पंजाब राज्य का हिस्सा रहा। सन् 1950 में इस राज्य को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया, परन्तु 1971 में ‘हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम-1971’ के अन्तर्गत इसे 25 जून 1971 को भारत का अठारहवाँ राज्य बना दिया गया। हिमाचल प्रदेश में प्रतिव्यक्ति अनुमानित आय भारत के अन्य किसी भी राज्य की तुलना में ज़्यादा है। नदियों की बहुतायत के कारण, हिमाचल अन्य राज्यों को पनबिजली देता है, जिनमें दिल्ली, पंजाब और राजस्थान प्रमुख रूप से हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था पनबिजली, पर्यटन और कृषि पर मूल रूप से आधारित है। राज्य में हिन्दुओं की संख्या कुल जनसंख्या का 90 प्रतिशत है और मुख्य समुदायों में ब्राह्मण, राजपूत, कन्नेत, राठी और कोली हैं। Click Here and book Himachal Pradesh Tour Packages  at Lowest price at swantour.com its leading travel agents in India since 1995.

हिमाचल प्रदेश की संस्कृति  

पहाड़ी लोगों के मेले और त्योहार उल्लासपूर्ण गीतों और नृत्य के अवसर होते हैं। उत्कृष्ट शैली में बनी किन्नौर शॉलें, कुल्लू की विशिष्ट ऊनी टोपियाँ और चंबा के क़सीदाकारी किये हुए रूमाल त्योहार के रंगीन परिधानों को और भी विशिष्टता प्रदान करते हैं। हिमाचल प्रदेश अपनी कांगड़ा घाटी चित्रकला शैली के लिए भी जाना जाता है। शिमला की पहाड़ियाँ, कुल्लू घाटी (मनाली शहर सहित) और डलहौज़ी पर्यटकों के बड़े आकर्षण हैं। स्कीइंग, गॉल्फ़, मछली पकड़ना, लम्बी यात्रा और पर्वतारोहण ऐसी गतिविधियाँ हैं, जिनके लिए हिमाचल प्रदेश एक आदर्श स्थान है। कुछ पौराणिक धर्मस्थलों पर पूजा-अर्चना के लिए हिमाचल और उसके पड़ोसी राज्यों के श्रद्धालु बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं।

कुल्लू घाटी देवताओं की घाटी के रूप में जानी जाती है; इसके चीड़ और देवदार के जंगल, फूलों से लदे हरे-भरे मैदान और फलों के बगीचे प्रत्येक शरद ऋतु में होने वाले दशहरा महोत्सव के लिए माहौल तैयार कर देते हैं। इस मौक़े पर मन्दिरों के देवताओं को सजी हुई पालकियों में गाजे-बाजे के साथ और नाचते हुए निकाला जाता है। 1959 में ल्हासा पर चीन के क़ब्ज़े के परिणामस्वरूप दलाई लामा तिब्बत से पलायन कर धर्मशाला आ गए थे और यहीं रहने लगे। इसके बाद से ही बौद्धों के लिए (ख़ासकर तिब्बतियों के लिए) धर्मशाला पवित्र स्थान हो गया है। वर्ष 2000 की शुरुआत में 14 वर्षीय 17वें करमापा भी तिब्बत से भागकर धर्मशाला आ गए और शरण माँगी।

हिमाचल प्रदेश में मुख्य रूप से हिन्दी, काँगड़ी, पहाड़ी, पंजाबी, तथा डोगरी आदि भाषाऐं बोली जाती हैं। हिन्दू, बौद्ध और सिक्ख आदि यहाँ के प्रमुख धर्म हैं। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, सिरमौर, मण्डी ऊपरी क्षेत्र किन्नौर, शिमला इत्यादि जनपदों में नाटी नृत्य मुख्य रूप से किया जाता है। मध्‍यकाल में जब उत्‍तर-पश्चिम से आक्रमण हुए तो राजपूताना और आसपास के क्षेत्रों के राजवंश यहां आकर बस गए। और अन्‍होनें अपनी रियासतें स्‍थापित कीं इन राजवंशों ने यहाँ के स्‍थानीय लोगों को सभ्‍य-संस्‍कृत बनाया और भारतीय चित्रकला की अद्धितीय धरोहर पहाड़ी कला और स्‍थापत्‍य कला को प्रश्रय दिया।

हिमाचल प्रदेश इतिहास और भूगोल

हिमाचल प्रदेश पश्चिमी हिमालय के मध्य में स्थित है, इसे देव भूमि कहा जाता है। यहाँ देवी और देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। हिमाचल राज्य में पत्थर और लकड़ी के अनेक मंदिर हैं। सम़ृद्ध संस्कृति और परम्पराओं ने हिमाचल को एक अनोखा राज्य बना दिया है। यहाँ के ऊंचे नीचे पहाड़, ग्लेशियर, छायादार घाटियां और विशाल पाइन वृक्ष और गरजती नदियां तथा विशिष्ट जीव जंतु मिलकर हिमाचल के लिए एक मधुर संगीत की रचना तैयार करते प्रतीत होते हैं।

हिमाचल प्रदेश पूर्ण राज्य 25 जनवरी, 1971 को बना। अप्रैल 1948 में यहाँ की 27,000 वर्ग किमी में फैली हुई लगभग 30 रियासतों को मिलाकर इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। 1954 में ‘ग’ श्रेणी की रियासत तबलासपुर को इसमें मिलाने पर इसका क्षेत्रफल बढ़कर 28,241 वर्ग किमी हो गया। सन् 1966 में इस केन्द्रशासित प्रदेश में पंजाब के पहाड़ी भाग को मिलाकर इस राज्य का पुनर्गठन किया गया और इसका क्षेत्रफल बढ़कर 55,673 वर्ग किमी हो गया। आज हिमाचल प्रदेश में न केवल पहाड़ी क्षेत्रों का विकास हुआ, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं में भी इस प्रदेश ने उल्लेखनीय विकास प्राप्त किया है।

हिमाचल प्रदेश पर्यटन आकर्षण

चंबा घाटी

चंबा घाटी की अमूल्य धरोहर खूबसूरत डलहौजी

चंबा घाटी (915 मीटर) की ऊंचाई पर रावी नदी के दाएं किनारे पर है। पुराने समय में राजशाही का राज्‍य होने के नाते यह लगभग एक शताब्‍दी पुराना राज्‍य है और 6वीं शताब्‍दी से इसका इतिहास मिलता है। यह अपनी भव्‍य वास्‍तुकला और अनेक रोमांचक यात्राओं के लिए एक आधार के तौर पर विख्‍यात है। चंबा घाटी की यह अमूल्य धरोहर गर्मी में मन को असीम आनंद देने वाली साबित होती है। सर्दी के मौसम में यहां बर्फ  का मजा लिया जा सकता है। तब यहां का तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है। जब मैदानी इलाकों में भयंकर गर्मी पड़ रही होती है तो यहां का तापमान भी 35 डिग्री तक पहुंच जाता है। इस जगह की खोज 19वीं शताब्दी के मध्य में ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने की थी।   कांगड़ा से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं डलहौजी। जहां पहाड़ों का राजा कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में कदम-कदम पर प्रकृति ने सुंदरता के एक से बढ़कर एक नमूने बिखरा दिए हैं। जहां जाएं बस मन मचलकर रह जाए। यहां की शीतल, मंद और महकती हवाएं हर किसी के मन को मोह लेती है। जब किसी ऐसी जगह पहुंच जाएं जहां बस पहाड़ हों, पेड़ हों और दूर-दूर तक फैली हरियाली हो तो यह नजारा और भी मन को मोहने वाला होता है। Click Here and book India Holiday Packages with memorable vacation in Himachal Pradesh Tours.

चंबा घाटी की यह अमूल्य धरोहर गर्मी में मन को असीम आनंद देने वाली साबित होती है। सर्दी के मौसम में यहां बर्फ का मजा लिया जा सकता है। तब यहां का तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है। जब मैदानी इलाकों में भयंकर गर्मी पड़ रही होती है तो यहां का तापमान भी 35 डिग्री तक पहुंच जाता है। इस जगह की खोज 19वीं शताब्दी के मध्य में ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने की थी।
डलहौजी अपने आपमें ही बेहद खूबसूरत जगह है। कुदरत ने डलहौजी के आस-पास भी बेहद खूबसूरती बिखेर रखी है। दर्जनों ऐसे स्थल हैं जहां सुकून के साथ कुछ समय बिताया जा सकता है। आइए जानते हैं यहां के कुछ खास स्थल जिसे आप प्राथमिकता से देख सकते हैं।

बड़ा पत्थर

डलहौजी से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित अहला गांव में भुलावनी माता का मंदिर है जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

चंबा घाटी धाइनकुंड

यह स्थान डलहौजी से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से व्यास, चिनाब और रावी नदियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। यहां आने वाले सैलानियों के लिए यह मशहूर पर्यटक स्थल बन चुका है।

चंबा घाटी बकरोटा हिल्स

यहां घूमने आने वालों के लिए बकरोटा मॉल बेहद लोकप्रिय जगह है। यहां से पहाड़ी वादियों का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है।

चंबा घाटी कालाटोप

लगभग साढ़े आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित कालाटोप में छोटी सी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी है। यहां जंगली जानवरों को नजदीक से देखा जा सकता है।

चंबा घाटीसुभाष बावली

जीपीओ से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है सुभाष बावली। यहां से बर्फ से ढंकी चोटियों को आसानी से देखा जा सकता है।

चंबा घाटी सतधारा

यहां के पानी को पवित्र माना जाता है। हालांकि इस पानी में कई तरह के खनिज पदार्थ होने की वजह से यह दवाई का काम करता है।

चंबा घाटी पंजपुला

यहां का नजारा देखने लायक होता है। यहां पानी पांच छोटे-छोटे पुलों के नीचे से बहता है। यह स्थान दो किमी की दूरी पर स्थित है।

चंबा घाटी कैसे पहुंचें

सड़क मार्ग से आने वाले पर्यटकों को यहां पहुंचना बिलकुल भी मुश्किल नहीं है। दिल्ली,एनसीआर से चंडीगढ़ होते हुए डलहौजी आसानी से पहुंचा जा सकता है। कांगड़ा का रेलवे स्टेशन भी सबसे नजदीक पड़ता है जो यहां से 18 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। कांगड़ा में स्थित गागल हवाई अड्डा यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है। जो सैलानियों के लिए कांगड़ा के बाद ऐसा पहाड़ी स्थल, जो सिर्फ 12 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है।  दिल्ली से 514 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डलहौजी में आकर सभी का मन बाग-बाग हो जाता हैं। यहां की दूरी चंडीगढ़ से 239 किमी, कुल्लू से 214 किमी और शिमला से 332 किमी है। चंबा यहां से 192 किलोमीटर दूर है। यहां आने का सबसे अच्छा समय अप्रैल से जून और सितंबर-अक्टूबर का माह होता है। यहां का सुबह-शाम का मौसम तो मन मोहने वाला होता है, जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है।

डलहौज़ी

पश्चिमी हिमाचल प्रदेश में डलहौज़ी नामक यह पर्वतीय स्‍थान पुरानी दुनिया की चीजों से भरा पड़ा है और यहां राजशाही युग की भाव्‍यता बिखरी पड़ी है। यह लगभग 14 वर्ग किलो मीटर फैला है और यहां काठ लोग, पात्रे, तेहरा, बकरोटा और बलूम नामक 5 पहाडियां है। इसे 19वीं शताब्‍दी में ब्रिटिश गवर्नर जनरल, लॉड डलहौज़ी के नाम पर बनाया गया था। इस कस्‍बे की ऊंचाई लगभग 525 मीटर से 2378 मीटर तक है और इसके आस पास विविध प्रकार की वनस्‍पति-पाइन, देवदार, ओक और फूलों से भरे हुए रोडो डेंड्रॉन पाए जाते हैं डलहौज़ी में मनमोहक उप निवेश यु‍गीन वास्‍तुकला है जिसमें कुछ सुंदर गिरजाघर शामिल है। यह मैदानों के मनोरम दृश्‍यों को प्रस्‍तुत करने के साथ एक लंबी रजत रेखा के समान दिखाई देने वाले रावी नदी के साथ एक अद्भुत दृश्‍य प्रदर्शित करता है जो घूम कर डलहौज़ी के नीचे जाती है। बर्फ से ढका हुआ धोलाधार पर्वत भी इस कस्‍बे से साफ दिखाई देता है। भारत के हिमाचल परदेस में डलहौज़ी सबसे प्राचीन हिल स्टेशन है | यह एक ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड डलहौज़ी के नाम पर है | यह शहर अंग्रेजो द्वारा १८५४ में स्थापित किया गया था | यह चारो तरफ से हिमालय पर्वतों और हरे भरे पेड़ पौधों से घिरा है | यहाँ पर आप नीचे दीये गये स्थानों पर घूमने जा सकते है |

डलहौज़ी में घूमने की रोमांटिक जगह

डलहौज़ी,पञ्च पुल्ला

पञ्च पुल्ला एक बहुत ही सुंदर जगह है | माना जाता है कि पंच्पुल्ला की धारा डलहौजी और आस पास के गाँवो में पानी की आपूर्ति का मुख्य स्रोत है | वहा पर एक महान स्वतंत्रता सेनानी सरदार अजीत सिंह की समाधी भी है |

डलहौज़ी,सतधारा फाल्स

डलहौज़ी में सतधारा फाल्स प्राकृतिक सुन्दरता और शांत वातावरण के कारण पर्यटनो के लिए आकर्षण का कारण है | यहाँ का अद्भुत झरना, बर्फ से ढके पहाड़, देवदार और चीड के पेड़ो से घिरा दृश्य बहुत ही सुंदर लगता है |

खज्जियार डलहौज़ी

खज्जियार डलहौज़ी से 24 किलोमीटर दूर स्थित हिल स्टेशन है | यह हिल स्टेशन घास के मैदान और जंगलो से घिरा है | यह कालाटोप अभयारण्य का हिस्सा है |

कालाटोप वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी

भारत के हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में  कालाटोप और खज्जियार पर एक 30.69 वर्ग किमी में पशु अभयारण्य है | यहाँ पर तितर, सिरो और काले भालू पाए जाते है |

सुभाष बावली

सुभाष बावली डलहौजी से 1 किमी दूर स्थित है | यह महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोश आकर अपना समय बिताया करते थे |

डैकुंडी पीक

डलहौजी में डैणकुण्ड बहुत ही ऊँची चोटियों में से एक है | यह अपने बर्फ से ढके चोटियों और हरे भरे वातावरण के कारण लोगो को आकर्षित करता है | वहा पर एक मोटर योग्य सड़क है | जो कि इस पहाड़ी की तरफ जाता है |

रिवर क्रासिंग और रिवर राफ्टिंग

चंबा में रावी नदी पर रिवर राफ्टिंग भी किया जाता है | यह प्रशिक्षित प्रशिक्षकों की देख रेख में किया जाता है |

चामुंडा देवी मंदिर

चामुंडा देवी मंदिर बानेर नदी के तट पर स्थित है | यह इस जगह का सबसे प्रशिद्ध मंदिर है |

डलहौज़ी कैसे पहुंचें

कैसे पहुंचें: दिल्ली-एनसीआर से चंडीगढ़ होते हुए डलहौजी आसानी से पहुंचा जा सकता है। कांगड़ा का रेलवे स्टेशन भी सबसे नजदीक पड़ता है जो यहां से 18 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। कांगड़ा में स्थित गागल हवाई अड्डा यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है। जो सैलानियों के लिए कांगड़ा के बाद ऐसा पहाड़ी स्थल, जो सिर्फ 12 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है।

धर्मशाला

धर्मशाला की ऊंचाई 1,250 मीटर (4,400 फीट) और 2,000 मीटर (6,460 फीट) के बीच है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, जहां पाइन के ऊंचे पेड़, चाय के बागान और इमारती लकड़ी पैदा करने वाले बड़े वृक्ष ऊंचाई, शांति तथा पवित्रता के साथ यहां खड़े दिखाई देते हैं। वर्ष 1960 से, जब से दलाई लामा ने अपना अस्‍थायी मुख्‍यालय यहां बनाया, धर्मशाला की अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति भारत के छोटे ल्‍हासा के रूप में बढ़ गई है। ओक और शंकुधारी वृक्षों से भरे जंगलों के बीच बसा यह शहर कांगड़ा घाटी का मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यताप्राप्त धर्मशाला को ‘भारत का छोटा ल्हासा’ उपनाम से भी जाना जाता है. हिमालय की दिलकश, बर्फ से ढकी चोटियां, देवदार के घने जंगल, सेब के बाग, झीलों व नदियों का यह शहर पर्यटकों को प्रकृति की गोद में होने का एहसास देता है. कांगड़ा कला संग्रहालय: कला और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए यह संग्रहालय एक बेहतरीन स्थल हो सकता है. धर्मशाला के इस कला संग्रहालय में यहां के कलात्मक और सांस्कृतिक चिह्न मिलते हैं. 5वीं शताब्दी की बहुमूल्य कलाकृतियां और मूर्तियां, पेंटिंग, सिक्के, बरतन, आभूषण, मूर्तियां और शाही वस्त्रों को यहां देखा जा सकता है.

धर्मशाला मैकलौडगंज :

मैकलौडगंज : अगर आप तिब्बती कला व संस्कृति से रूबरू होना चाहते हैं तो मैकलौडगंज एक बेहतरीन जगह हो सकती है. अगर आप शौपिंग का शौक रखते हैं तो यहां से सुंदर तिब्बती हस्तशिल्प, कपड़े, थांगका (एक प्रकार की सिल्क पेंटिंग) और हस्तशिल्प की वस्तुएं खरीद सकते हैं. यहां से आप हिमाचली पशमीना शाल व कारपेट, जो अपनी विशिष्टता के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित हैं, की खरीदारी कर सकते हैं. समुद्रतल से 1,030 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मैकलौडगंज एक छोटा सा कसबा है. यहां दुकानें, रेस्तरां, होटल और सड़क किनारे लगने वाले बाजार सबकुछ हैं. गरमी के मौसम में भी यहां आप ठंडक का एहसास कर सकते हैं. यहां पर्यटकों की पसंद के ठंडे पानी के झरने व झील आदि सबकुछ हैं. दूरदूर तक फैली हरियाली और पहाडि़यों के बीच बने ऊंचेनीचे घुमावदार रास्ते पर्यटकों को ट्रैकिंग के लिए प्रेरित करते हैं.

धर्मशाला कररी:

कररी : यह एक खूबसूरत पिकनिक स्थल व रैस्टहाउस है. यह झील अल्पाइन घास के मैदानों और पाइन के जंगलों से घिरी हुई है. कररी 1983 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. हनीमून कपल्स के लिए यह बेहतरीन सैरगाह है.

मछरियल और ततवानी धर्मशाला

मछरियल और ततवानी : मछरियल में एक खूबसूरत जलप्रपात है जबकि ततवानी गरम पानी का प्राकृतिक सोता है. ये दोनों स्थान पर्यटकों को पिकनिक मनाने का अवसर देते हैं.

धर्मशाला कैसे जाएं

धर्मशाला जाने के लिए सड़क मार्ग सब से बेहतर रहता है लेकिन अगर आप चाहें तो वायु या रेलमार्ग से भी जा सकते हैं.

धर्मशाला वायुमार्ग : कांगड़ा का गगल हवाई अड्डा धर्मशाला का नजदीकी एअरपोर्ट है. यह धर्मशाला से 15 किलोमीटर दूर है. यहां पहुंच कर बस या टैक्सी से धर्मशाला पहुंचा जा सकता है.

 धर्मशाला रेलमार्ग : नजदीकी रेलवे स्टेशन पठानकोट यहां से 95 किलोमीटर दूर है. पठानकोट और जोगिंदर नगर के बीच गुजरने वाली नैरोगेज रेल लाइन पर स्थित कांगड़ा स्टेशन से धर्मशाला 17 किलोमीटर दूर है.

 धर्मशाला सड़क मार्ग : चंडीगढ़, दिल्ली, होशियारपुर, मंडी आदि से हिमाचल रोड परिवहन निगम की बसें धर्मशाला के लिए नियमित रूप से चलती हैं. उत्तर भारत के प्रमुख शहरों से यहां के लिए सीधी बससेवा है. दिल्ली के कश्मीरी गेट और कनाट प्लेस से आप धर्मशाला के लिए बस ले सकते हैं.

धर्मशाला कब जाएं

धर्मशाला में गरमी का मौसम मार्च से जून के बीच रहता है. इस दौरान यहां का तापमान 22 डिगरी सैल्सियस से 38 डिगरी सैल्सियस के बीच रहता है. इस खुशनुमा मौसम में पर्यटक ट्रैकिंग का आनंद भी ले सकते हैं. मानसून के दौरान यहां भारी वर्षा होती है. सर्दी के मौसम में यहां अत्यधिक ठंड होती है और तापमान -4 डिगरी सैल्सियस के भी नीचे चला जाता है जिस के कारण रास्ते बंद हो जाते हैं और विजिबिलिटी कम हो जाती है. इसलिए धर्मशाला में घूमने के लिए जून से सितंबर के महीने उपयुक्त हैं. Click Here and book Dalhousie Dharamshala Amritsar Tour at lowest price

कुफरी

अनंत दूरी तक चलता आकाश, बर्फ से ढकी चोटियां, गहरी घाटियां और मीठे पानी के झरने, कुफरी में यह सब है। यह पर्वतीय स्‍थान शिमला के पास समुद्री तल से 2510 मीटर की ऊंचाई पर हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी भाग में स्थित है। कुफरी में ठण्‍ड के मौसम में अनेक खेलों का आयोजन किया जाता है जैसे स्‍काइंग और टोबोगेनिंग के साथ चढ़ाडयों पर चढ़ना। ठण्‍ड के मौसम में हर वर्ष खेल कार्निवाल आयोजित किए जाते हैं और यह उन पर्यटकों के लिए एक बड़ा आकर्षण है जो केवल इन्‍हें देखने के लिए यहां आते हैं। यह स्‍थान ट्रेकिंग और पहाड़ी पर चढ़ने के लिए भी जाना जाता है जो रोमांचकारी खेल प्रेमियों का आदर्श स्‍थान है।  हिमाचल प्राकृतिक सौंदर्य से लबालब है। यहां की खूबसूरत हरी भरी वादियां, यहां की संस्कृति, उत्सव, मेले और यहां के भोले-भाले लोगों का स्नेह यहां आने वालों को बार-बार आने के लिए उत्साहित करता है। प्रकृति की गोद में बसा हिमाचल पर्यटकों को यहां बर्बस ही खींच लाता है। वहीं सर्दी के मौसम में यह पर्यटन स्थल कुफरी बर्फ की चादर ओढ़े ओर भी खुबसूरत हो उठता है।  ऐसे ही हिमाचल प्रदेश के दक्षिणी हिस्से में स्थित कुफरी जो शिमला से करीब 22 किमी. दूर स्थित है। एक छोटा सा शहर है जो शिमला में ही स्थित है। यहां आप अपने परिवार के साथ पिकनिक पर जा सकते हैं। यहां आप हॉर्स राइडिंग, बंज्जी जंपिंग, रोप क्लाइम्बिंग, जिप लाइनिंग का लुत्फ उठा सकते हैं। हालांकि यह जगह थोड़ी महंगी है, लेकिन आप यहां भरपूर आनंद उठा सकते हैं।

कुफरी में स्किंग, ट्रेकिंग और हाइकिंग करते पर्यटक

हिमाचल प्रदेश स्थित कुफरी को सर्दियों का हॉटेस्ट प्लेस कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस दौरान पर्यटक अपने स्कीइंग गीयर्स के साथ यहां पहुंचते हैं और एक-दूसरे पर बर्फ के गोले फेंकने और स्नो मैन बनाने के लिए तैयार रहते हैं। इस दौरान आने वाले पर्यटकों के कोलाहल से यहां की पहाडिय़ां जीवंत हो उठती हैं। स्की स्लोप्स से लोगों को उतरते देखना काफी रोमांचक होता है। कुफरी की सफेद भुरभुरी दुनिया में प्रवेश कर आप भी बर्फ के साम्राज्य का आनंद ले सकते हैं।  कुफरी अपने ट्रेकिंग और हाइकिंग रूट्स के कारण भी जाना जाता है। यह हिल रिसोर्ट समुद्र तल से 2,510 मी. की ऊंचाई पर स्थित है और विभिन्न आकर्षणों से भरपूर है। प्रत्येक वर्ष हजारों पर्यटक कुफरी पहुंचते हैं और एक बार यहां पहुंचने पर हमेशा के लिए यहीं बसना चाहते हैं। हाइकिंग, स्कीइंग, खूबसूरत नजारे, देवदार के वृक्षों की मीठी सुगंध और ठंडी-ठंडी बहती हवाएं-यह सब आपको कुफरी में मिलेगा।

शिमला की बर्फीली टोपी: कुफरी

इस जगह का नाम कुफ्र शब्द से पड़ा है, जिसका स्थानीय भाषा में मतलब है झील। इस जगह के साथ जुड़े आकर्षण के कारण यहां वर्ष भर पर्यटक आते हैं। महासू पीक, ग्रेट हिमालयन नेचर पार्क, और फागू कुफरी में कुछ प्रमुख पर्यटन स्थलों में से हैं।

कुफरी का तापमान

कुफरी मानसून के मौसम के दौरान अल्प वर्षा प्राप्त करता है और तापमान 10 डिग्री तक गिर जाता है। सर्दियों में बहुत ठंड होती हैं और इस दौरान तापमान शून्य से नीचे गिर सकता है। मार्च और नवंबर के बीच की अवधि में इस जगह का दौरा करने के लिए आदर्श माना जाता है।
कब जाएं- जैसा कि हमने पहले ही कहा है कि शिमला की हसीन वादियां वर्षपर्यंत पर्यटकों का स्वागत करती हैं। सावधानी बरतें।यहां सालभर किसी भी मौसम में जाया जा सकता है। केवल भारी बर्फबारी के समय सड़क बंद होने की स्थिति में ही पर्यटकों को तकलीफों का सामना करना पड़ सकता है। यदि आप सर्दियों के मौसम में शिमला जाने की तैयारी करें तो पहले शिमला और हिमाचल के मौसम के बारे में जरूर पता कर लें।

कुफरी कैसे जाएं

कुफरी कैसे जाएं-कालका, चंडीगढ़, दिल्ली, अमृतसर, जम्मू और पंजाब शहर से शिमला के लिए नियमित रूप से बस सेवा उपलब्ध है। इसके अलावा आप यहां से टैक्सी भी किराए पर ले सकते हैं। यदि स्वयं के वाहन को चला रहे हैं तो कुफरी और ऊंची पहाडिय़ों पर अतिरिक्त

कुफरी रेलमार्ग:- यदि आप शिमला आ रहे हैं तो कालका से टॉयट्रेन लेना न भूलें। कालका से शिमला का सफर 95 किमी तक का है।

कुफरी वायुमार्ग- चूंकी शिमला हिमाचल की राजधानी है, इसलिए हर प्रमुख शहर से यहाँ के लिए वायुसेवा उपलब्ध है।

कुफरीसड़क मार्ग राज्य परिवहन की बसें और निजी डीलक्स बसें दोनों, आसानी से शिमला से कुफरी के लिए उपलब्ध हैं। कुफरी का क्षेत्र में अप्रैल और जून के महीने के बीच गर्मियों के दौरान समशीतोष्ण जलवायु का पाया जाता है। इस मौसम के दौरान इस जगह का तापमान 12 डिग्री सेल्सियस और 19 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है।

मनाली

कुल्‍लू से उत्तर दिशा में केवल 40 किलो मीटर की दूरी पर लेह की ओर जाने वाले राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर घाटी के सिरे के पास मनाली स्थित है। लाहुल, स्‍पीति, बारा भंगल (कांगड़ा) और जनस्‍कर पर्वत श्रृंखला पर चढ़ाई करने वालों के लिए यह एक मनपसंद स्‍थान है। मंदिरों से अनोखी चीजों तक, यहां से मनोरम दृश्‍य और रोमांचकारी गतिविधियां मनाली को हर मौसम और सभी प्रकार के यात्रियों के बीच लोकप्रिय बनाती हैं।

मनाली, सोलांग घाटी

सोलंग घाटी शहर के केंद्र 1 से 8 किलोमीटर की दूरी पर 19 स्थानों से बाहर मनाली में जाएँ | ब्यास कुंड और सोलांग गांव के बीच एक घाटी अपने सभी आगंतुकों के साथ ही स्थानीय लोगों के लिए एक पसंदीदा हो जाता है। इसके अलावा बर्फ बिंदु के रूप में जाना जाता है, सोलांग घाटी ग्लेशियर और बर्फ से ढकी परिदृश्य के लिए बल्कि अनगिनत गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है कि यहाँ का आनंद  लिया जा सकता है |

मनाली,रोहतांग  पास

रोहतांग पास शहर के केंद्र 2 से 16 किलोमीटर की दूरी पर 19 स्थानों से बाहर मनाली में जाएँ | रोहतांग पास का जो परिदृश्य, स्पीति और लाहौल की तरह हिमाचल के अधिक काल्पनिक और यात्रा के लिए मनाली से जोड़ता है, और एक ही है। इस विशाल बर्फ रेगिस्तान केवल कुछ अन्य और एक दृश्य के एक याद नहीं करना चाहिए, जबकि यहाँ की तरह एक परिदृश्य है।

मनाली,हडिम्बा  मंदिर

हडिम्बा  मंदिर शहर के केंद्र 3 से 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है | हडिम्बा दैवी मंदिर, ऊधम और शहर के जीवन की हलचल से दूर, देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ एक विशाल शांत जगह है। मंदिर हिडिम्बा, भीम, महान भारतीय महाकाव्य महाभारत के पांच पांडव राजकुमार से एक की पत्नी को समर्पित है। मंदिर का मुख्य आकर्षण तीन दिन हिडिम्बा देवी महोत्सव, जो दुनिया भर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है और रंगीन लोक नृत्य प्रदर्शन विशेषताएं है।

मनाली,अर्जुन गुफा

इस गुफा को देखने के लिए देशभर से सैलानी यहां आते हैं। यह गुफा पिरनी गांव में है। मान्यता है कि महाभारत काल में अर्जुन ने यहां ठहर करके पशुपति अस्त्र हासिल किया था।

मनाली,नेहरू कुंड

रोहतांग मार्ग पर बना यह सुन्दर प्राकृतिक झरना मनाली से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहां सुबह-शाम सैलानियों का जमावड़ा रहता है।

मनाली,के आसपास  दर्शनीय स्थल

मनाली से कुछ दूरी पर है कुल्लू घाटी। यहां कलकल करती नदियां, पहाडियों से गिरते झरने, देवदार के घने वृक्ष कुल्लू घाटी के प्राकृतिक सौन्दर्य को बयां करते हैं। कुल्लू में ढेर सारे दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें प्रमुख हैं मणिकर्ण। यहां कुदरती गर्म पानी के चश्मे (झरने) हैं। मणिकर्ण की दूरी कुल्लू से 40 किलोमीटर है। मणिकर्ण से 30 किलोमीटर आगे बर्फ से ढका ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क है, जिसमें कलरव करते रंग-बिरंगे पक्षी, कस्तूरी मृग, तेंदुए तथा तीतर भी देखे जा सकते हैं। इसके अलावा व्यास नदी के किनारे फलों के बागों की खूबसूरती देखते ही बनती है। ‘कुल्लू’ का दशहरा भी विश्व प्रसिद्ध है। यह त्योहार दशहरे के बाद शुरू होता है और करीब पन्द्रह दिन तक चलता है।

मनाली एडवेंचर/ट्रेकिंग

मनाली न केवल प्राकृतिक दृश्यों के कारण पर्यटकों को बांधे रखने में सक्षम है, बल्कि यहां उपलब्ध एडवेंचर टूरिज्म के कारण बार-बार यहां आने का मन करता है। एक ओर हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग लर्जी, कटरैन तथा कसौल में मछली के शिकार की सुविधा देता है तो वहीं रोहतांग-ला में आप माउन्टेन बाइकिंग का मजा ले सकते हैं। मई से मध्य जून, सितम्बर से मध्य अक्तूबर तक व्यास नदी में राफ्टिंग का लुफ्त लिया जा सकता है। अगर आप अधिक रोमांच चाहते हैं तो मनाली के उत्तर में सोलांग नल्ला बाहें पसारे आपका स्वागत करता है। यहां पर पर्वतारोहण, ट्रैकिंग के लिए भी ढेर सारी जगहें हैं। Click Here and book Manali Tour Packages at lowest price from Swantour.com.

मनाली क्या खरीदें

हिडिम्बा मन्दिर के पास म्यूजियम ऑफ ट्रेडीशनल हिमाचल कल्चर है। इस संग्रहालय से आप अपने प्रियजनों के लिए हस्तशिल्प तथा कला के नमूने खरीद सकते हैं।

मनाली के पर्व, त्योहार, उत्सव

कुल्लू मनाली में हर वर्ष ढेर सारे पर्व त्योहार व उत्सव मनाए जाते हैं। मंडी का शिवरात्रि मेला, मार्च के महीने में लगता है। इसी महीने की 13 व 14 तारीख को ‘शिशु’ नाम का त्योहार मनाया जाता है। अप्रैल से जून तक व्यास नदी पर वॉटर राफ्टिंग का आयोजन किया जाता है। मई के महीने में मनाली में डूंगरी मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें आसपास के हजारों लोग भाग लेते हैं। इसके बाद सितम्बर में वॉटर स्पोर्ट्स होते हैं। अक्तूबर माह में कुल्लू का विश्वप्रसिद्ध मेला, कुल्लू का दशहरा मनाया जाता है, जो करीब 15 दिनों तक चलता है। इसके बाद अक्तूबर के आखिरी दिनों में पैराग्लाइडिंग खेलों का आयोजन किया जाता है जो नवम्बर माह तक चलते हैं।

मनाली में साहसिक गतिविधियां

यहाँ  साहसिक गतिविधियां शहर के केंद्र 4 से 12 किलोमीटर 19 स्थानों से बाहर मनाली में  इस का लुत्फ ले सकते है | मनाली में साहसिक गतिविधियों का केंद्र है। पैराग्लाइडिंग के लिए स्कीइंग के लिए घोड़े की सवारी करने के लिए ज़ोर्बिंग करने के लिए अवसरों ट्रेकिंग के लिए सफेद रिवर राफ्टिंग से, मनाली सब कुछ की मजूद है |

मनाली कब जाएं :

मनाली में सालभर सुखद जलवायु का आनन्द मिलता है,जो इसे पूरे साल पर्यटन लायक बनाता है। वैसे शिमला जाने के लिए उपयुक्त समय अप्रैल और अक्टूबर के मध्य अथवा दिसम्बर और मार्च के बीच है।

मनाली कैसे जाएं:

मनाली वायु, रेल और सड़क द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। जुबर्हती एयर पोर्ट इस स्थान के लिए निकटतम एयर बेस है। कालका रेलवे स्टेशन से यहां पहुंच सकते हैं। इसके अलावा पड़ोसी शहरों से सड़क मार्ग की सुविधाएं हैं।

सड़क मार्ग: कुल्लू मनाली, दिल्ली से 600 किलोमीटर की दूरी पर है। यह शिमला से सीधे सड़क मार्ग से जुड़ा है। दिल्ली, शिमला व चंडीगढ़ से मनाली के लिए हिमाचल परिवहन निगम की बसें उपलब्ध हैं। please click here and book Manali Volvo Packages  lowest price.

रेल मार्ग: यहां के लिए सीधी रेल सुविधा उपलब्ध नहीं है। निकटतम रेलवे स्टेशन चंडीगढ़ है। चंडीगढ़ से मनाली 260 किलोमीटर दूर है। आप शिमला होते हुए मनाली पहुंच सकते हैं। पिंजौर तक रेल द्वारा जाया जा सकता है।

वायु मार्ग: कुल्लू मनाली वायु मार्ग द्वारा भी जाया जा सकता है। यहां का निकटतम हवाई अड्डा भुयंक है, जो मनाली से 50 किलोमीटर दूरी पर है।

कुल्‍लू

कुल्लू घाटी को पहले कुलंथपीठ कहा जाता था। कुलंथपीठ का शाब्दिक अर्थ है रहने योग्‍य दुनिया का अंत। कुल्‍लू घाटी भारत में देवताओं की घाटी रही है। यहां के मंदिर, सेब के बागान और दशहरा हजारों पर्यटकों को कुल्‍लू की ओर आकर्षित करते हैं। यहां के स्‍थानीय हस्‍तशिल्‍प कुल्‍लू की सबसे बड़ी विशेषता है।

 

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क,कुल्‍लू

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क : कुल्लू आकर यात्रियों को ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में वन्य जीवन की एक विस्तृत विविधता को देखने का मौका मिलता है जहां पशुओं की 180 से अधिक प्रजातियां है।

पंडोह बांध,कुल्‍लू

पंडोह बांध : 76 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पंडोह बांध, ब्यास नदी पर निर्मित है। यह जल विद्युत शक्ति उत्पादक बांध कुल्लू और मनाली की बिजली की आवश्यक्ताओं को पूरा करता है।

कुल्लू ट्रैकिंग

कुल्लू ट्रैकिंग, पर्वतारोहण, लंबी पैदल यात्रा, पैराग्लाइडिंग, और रिवर राफ्टिंग जैसी विभिन्न साहसिक खेलों के लिए भी जाना जाता है। लोकप्रिय ट्रैकिंग ट्रेल्स लद्दाख घाटी, जांस्कर घाटी, लाहौल और स्पीति हैं। साहसिक खेल पैराग्लाइडिंग के लिए कुल्लू भारत में प्रसिद्ध है। यहां आदर्श लांच साइटें सोलंग, महादेव, और बीर हैं। आगंतुकों को भी इस क्षेत्र में हनुमान टिब्बा, ब्यास कुंड, मलाना, देव टिब्बा और चन्द्रताल में पर्वतारोहण कर सकते हैं। यात्री ब्यास नदी में मछली पकडऩे की कोशिश भी कर सकते हैं।

कुल्‍लू में खूब रौनक

खूब रौनक: पूरे क्षेत्र में व्यवस्थित ढंग से दुकानें लगती हैं और बड़ी चहल-पहल होती है। दुकानों में हथकरघे पर बनी वस्तुएं, शॉलें, पट्टू, पुराने ढंग के बर्तन आदि कई चीजें ली जा सकती हैं। मैदान के साथ ही हिमाचल प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा नृत्य, नाटक और संगीत के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में राज्य तथा विदेशों की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। देशी और विदेशी पर्यटक यहां खूब आनंद लेते हैं। स्थानीय लोग पारंपरिक वेशभूषा में देखे जा सकते हैं। वास्तव में इस उत्सव के दौरान कुल्लू के सामाजिक रीति-रिवाज, लोगों के रहन-सहन, संगीत और नृत्य के प्रति उनके प्रेम के साथ ही क्षेत्रीय इतिहास और धार्मिक आस्थाओं को सजीव रूप में देखा जा सकता है।

कुल्‍लू में देवताओं का मिलन

देवताओं का मिलन : हिमाचल प्रदेश के कुल्लू दशहरा संपन्न होने से एक दिन पूर्व सभी देवी-देवता श्री रघुनाथ जी के पास जाते हैं। इस सभा को देवता दरबार कहा जाता है। उत्सव के अंतिम दिन रथ को व्यास नदी के किनारे पेड़ों के घने झुरमुट में ले जाया जाता है। फिर घास का एक छोटा सा ढेर लगाकर उसमें आग लगाई जाती है जो लंका दहन का प्रतीक है। शाम होते-होते उत्सव संपन्न हो जाता है। श्री रघुनाथ जी को सजी हुई पालकी में बैठाकर सुलतानपुर के मंदिर में पुन: ले जाकर स्थापित कर दिया जाता है। अन्य देवी-देवताओं को भी अपनी-अपनी सुविधानुसार मंदिरों में वापस ले जाकर पुन: स्थापित कर दिया जाता है। Click Here and book Manali Dharamshala Tour Packages at lowest price.

कुल्‍लू कुलंतापीठ में

कुलंतापीठ : समुद्रतल से लगभग 1200 मीटर की ऊंचाई पर बसे कुल्लू को प्राचीन काल में मनुष्य के रहने के अंतिम छोर पर बसा स्थान माना जाता था। लोकगीतों में कुल्लू को कुलंतापीठ अर्थात रहने योग्य अंतिम स्थान के नाम से संबोधित किया जाता है। वास्तव में कुल्लू का प्राचीन नाम कुलता है, जिसका उल्लेख विष्णु पुराण और रामायण में मिलता है। महाभारत में उत्तर भारत के राज्यों की सूची में भी इसका नाम है। सातवीं शताब्दी में आए चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी अपने यात्रा संस्मरण में क्यू-लू-तो नाम से इसका जिक्र किया है और इसे जालंधर से 117 मील उत्तर-पूर्व में स्थित बताया है। इस क्षेत्र के प्राचीनतम ऐतिहासिक दस्तावेजों में कुल्लू के राजा द्वारा जारी किया गया एक सिक्का भी है। इस पर लिखा है-रज्न कोतुलतरया वीरयस्सय अर्थात् कुलता या कुलतस का राजा। यद्यपि राजवंश की वंशावली में इस राजा का नाम नहीं मिलता। परंतु माना जाता है कि यह सिक्का पहली या दूसरी शताब्दी का है।

कुल्‍लू में वॉटर और एडवेंचर स्पोर्ट: 

वॉटर और एडवेंचर स्पोर्ट: कुल्लु घाटी में अनेक जगह ऐसी हैं जहां मछली पकडऩे का आनंद उठाया जा सकता है। इन जगहों में पिरडी, रायसन, कसोल नगर और जिया प्रमुख हैं। इसके साथ ही ब्यास नदी में वॉटर राफ्टिंग का मज़ा लिया जा सकता है। इन सबके अलावा यहां ट्रैकिंग भी की जा सकती है।

कुल्लु के आसपास दर्शनीय स्थल

नग्गर: यह स्थान करीब 1400 वर्षों तक कुल्लु की राजधानी रही है। यहां 16वीं शताब्दी में बने पत्थर और लकड़ी के आलीशान महल आज होटल में बदल चुके हैं। इन होटलों का संचालन हिमाचल पर्यटन निगम करता है। यहां रूसी चित्रकार निकोलस रोरिक की एक चित्र दीर्घा है। इन सबके अलावा यहां विष्णु, त्रिपुरा सुंदरी और भगवान कृष्ण के प्राचीन मंदिर भी हैं।

जगतसुख: जगतसुख कुल्लु की सबसे प्राचीन राजधानी है। यह विज नदी के बायीं ओर नगर और मनाली के बीच स्थित है। यहां दो प्राचीन मंदिर हैं। पहला गौरीशंकर मंदिर और दूसरा संध्या देवी का मंदिर है।

देव टिब्बा : समुद्र से 2953 मी. की ऊंचाई पर स्थित इस जगह को इंद्रालिका के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि महर्षि वशिष्ठ ने अर्जुन को पशुपति अस्त्र पाने के लिए तप करने का परामर्श दिया था। इसी स्थान पर अर्जुन ने इंद्र से यह अस्त्र पाने के लिए तप किया था।

बंजार: यहां श्रृंग ऋषि का प्रसिद्ध मंदिर है। इन्हीं ऋषि की याद में यहां प्रति वर्ष मई के महीने में एक उत्सव का आयोजन किया जाता है। ठहरने के लिए पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस उपलब्ध है। कुछ दूरी पर ही जलोड़ी पास है जो बंजार से सिर्फ 19 किलोमीटर दूरी पर है जो गर्मियों में भी बर्फ की चादर से लिप्त रहता है। यहां से कुछ दूरी पर सियोल्सर नाम की झील है, जो देवदार के उंचे-उंचे पेड़ों के हरे-भरे जंगल से घिरी हुई है जो बेहद सुन्दर है।

शिमला

हिमाचल प्रदेश की राजधानी और ब्रिटिश कालीन समय में ग्रीष्‍म कालीन राजधानी शिमला राज्‍य का सबसे महत्‍वपूर्ण पर्यटन केन्‍द्र है। यहां का नाम देवी श्‍यामला के नाम पर रखा गया है जो काली का अवतार है। शिमला लगभग 7267 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यह अर्ध चक्र आकार में बसा हुआ है। यहां घाटी का सुंदर दृश्‍य दिखाई देता है और महान हिमालय पर्वती की चोटियां चारों ओर दिखाई देती है। शिमला एक पहाड़ी पर फैला हुआ है जो करीब 12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है। इसके पड़ोस में घने जंगल और टेढ़े-मेढे़ रास्ते हैं, जहां पर हर मोड़ पर मनोहारी दृश्य देखने को मिलते हैं। यह एक आधुनिक व्यावसायिक केंद्र भी है। शिमला विश्व का एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। यहां प्रत्येक वर्ष देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग भ्रमण के लिए आते हैं। बर्फ से ढकी हुई यहां की पहाडि़यों में बड़े सुंदर दृश्य देखने को मिलते हैं जो पर्यटकों को बार-बार आने के लिए आकर्षित करते हैं। शिमला संग्रहालय हिमाचल प्रदेश की कला एवं संस्कृति का एक अनुपम नमूना है, जिसमें यहां की विभिन्न कलाकृतियां विशेषकर वास्तुकला, पहाड़ी कलम, सूक्ष्म कला, लकडि़यों पर की गई नक्काशियां, आभूषण एवं अन्य कृतियां संग्रहित हैं। शिमला में दर्शनीय स्थलों के अतिरिक्त कई अध्ययन केंद्र भी हैं, जिनमें लार्ड डफरिन द्वारा 1884-88 में निर्मित भारतीय उच्च अध्ययन केंद्र बहुत ही प्रसिद्ध है। यहां कुछ ऐतिहासिक सरकारी भवन भी हैं, जैसे वार्नेस कोर्ट, गार्टन कैसल व वाइसरीगल लॉज ये भी बड़े ही दर्शनीय स्थल हैं। चैडविक झरना भी एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। इसके साथ ही ग्लेन नामक स्थल भी है। इसके समीप बहता हुआ झरना और सदाबहार जंगल बहुत ही आकर्षक हैं।

शिमला जैसा कोई नहीं

शिमला खूबसूरत हिल स्टेशन है. यह हिमाचल प्रदेश की राजधानी है. यह समुद्र की सतह से 2,202 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. हिमालय पर्वत की निचली शृंखलाओं में बसा यह शहर देवदार, चीड़ और माजू के जंगलों से घिरा है. आप शिमला घूमने जा रहे हैं तो वहां रुकने की व्यवस्था पहले ही कर लें ताकि वहां पहुंचने के बाद ठहरने की व्यवस्था करने में समय बरबाद न करना पड़े. यहां छोटेबड़े कई रिजौर्ट हैं जहां सभी तरह की सुविधाएं मुहैया हैं. वहां ठहर कर आप अपनी छुट्टी का मजा दोगुना कर सकते हैं.

शिमला में एक ऐसा ही रिजौर्ट शिमला हैवेंस है. देवदार व चीड़ के पेड़ों से घिरा यह रिजौर्ट 6 एकड़ जमीन पर फैला है. यह शिमला के आईएसबीटी से 4 किलोमीटर और समर हिल रेलवे स्टेशन से 1 किलोमीटर की दूरी पर है. इस रिजौर्ट को शिमला की पारंपरिक वास्तुकला को ध्यान में रख कर बनाया गया है ताकि यहां आने वाले पर्यटक शिमला की संस्कृति से रूबरू हो सकें. शिमला हैवेंस के सीईओ संजय शर्मा बताते हैं कि यहां टीवी, वाईफाई व अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं. साथ ही, यहां रेस्तरां भी है जिस में कई तरह के व्यंजन मिलते हैं. खास बात यह है कि इस के सभी कमरों से देवदार व चीड़ के पेड़ों व पहाड़ों का खूबसूरत नजारा दिखता है.

रिजौर्ट में जिम की सुविधा है. रिजौर्ट में कैरेम बोर्ड, टेबल टैनिस, बास्केटबौल, बैडमिंटन जैसे खेल भी खेल सकते हैं. शिमला आएं तो आसपास के स्थानों को देखने के साथसाथ, आप को एडवैंचर का शौक है तो यहां साहसिक खेलों का भी आनंद उठाएं. पर्यटकों के अलावा भी कुछ है. बर्फ पर स्कीइंग करने वालों को जनवरी से मार्च मध्य के बीच यह मौका मिल जाता है. फिश्ंिग व गोल्फ के साथ ही आप यहां ट्रैकिंग का मजा भी ले सकते हैं. शिमला-किन्नौर क्षेत्र में नरकंडा से बंजर और सराहन से सांगला यहां के मशहूर ट्रैक रूट हैं. दोनों ही रूट 3 किलोमीटर की दूरी पर हैं. Click here and book Shimla Tour Packages

शिमला कब जाएं

वैसे तो शिमला किसी भी मौसम में घूमने जाया जा सकता है. लेकिन यहां आने का सब से अच्छा समय अप्रैल से जून और अक्तूबर से नवंबर का होता है. अगर आप को बर्फ पर स्कीइंग का शौक है तो जनवरी से मार्च मध्य तक का समय अच्छा है. सर्दी का मौसम स्कीइंग और आइस स्केटिंग का आनंद उठाने के लिए सब से अच्छा होता है जबकि दर्शनीय स्थलों की यात्रा और ट्रैकिंग के लिए गरमी का मौसम आदर्श होता है.

शिमला में क्या खाएं

क्या खाएं : शिमला में अधिकांश रेस्तरां माल रोड के साथसाथ हैं. यहां का खाना विशेष हिमाचली नहीं होता, बल्कि इन का स्वाद पंजाबी खाने की तरह होता है. यहां पंजाबी खाने के साथसाथ साउथ इंडियन, चाइनीज, कौंटिनैंटल आदि तरह के व्यंजन मिलते हैं. माल रोड पर कई बेकरियां भी हैं जो फास्ट फूड बेचती हैं जहां पिज्जा, बर्गर व पैटीज उपलब्ध होते हैं. यहां के स्ट्रीट फूड भी लाजवाब होते हैं. यहां आएं तो मशहूर फू्रट चाट व बटरबिस्कुट के साथ चाय जरूर ट्राई करें.

शिमला में दर्शनीय स्थल

माल रोड : शिमला घूमने जाएं तो माल रोड जाना न भूलें. बौलीवुड की कई फिल्मों में इस जगह को दिखाया गया है. यह रोड शहर के बीच में है. यह शिमला का मुख्य शौपिंग सैंटर है. यहां ब्रिटिश थिएटर भी है जो अब सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र है. यहां कई अच्छे रेस्तरां, बेकरी और आइसक्रीम पार्लर हैं. Click Here and Book Shimla Manali Tour packages at lowest price.

शिमला में स्कैंडल पौइंट

स्कैंडल पौइंट : माल रोड पर सब से ऊंचा पौइंट माना जाने वाला स्थान स्कैंडल पौइंट कहलाता है. यहां से माल रोड का नजारा देखते ही बनता है.

शिमला में राज्य संग्रहालय

राज्य संग्रहालय : यहां हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति, परिवेश, लोककलाओं, लघु पहाड़ी चित्रों, पुस्तकों, मुगल, राजस्थानी और समकालीन पेंटिंग्स, विभिन्न कांस्य कलाकृतियां, टिकट संग्रह, मानवविज्ञान संबंधित चीजें देखने को मिलती हैं.

शिमला में रिज

रिज : शहर के बीच में एक बड़ा और खुला स्थान है, जिसे रिज कहते हैं. यहां से पर्वत शृंखलाओं का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है. यह शिमला की सभी सांस्कृतिक गतिविधियों का हब है. यह माल रोड के साथ ही है. आसपास के क्षेत्रों में जाने के लिए आप सुबह 7 बजे से 9 बजे के बीच उपलब्ध स्थानीय बस सेवा का उपयोग कर सकते हैं. स्थानीय यात्रा और साइट सीइंग के लिए टैक्सियां भी उपलब्ध हैं. हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा टूरिस्ट बसें भी चलाई जाती हैं जिन की बुकिंग माल रोड पर स्थित पर्यटक सूचना केंद्र से होती है.

शिमला में चैल

चैल : शिमला के निकट बसा एक छोटा सा गांव चैल है. इस के चारों ओर घने वन हैं. यहां से हिमाचल की चोटियों पर हिम को देखा जा सकता है. सतलुज नदी के दोनों ओर स्थित कसौली और शिमला से इस की दूरी बराबर है. चैल का सब से आकर्षक क्षेत्र पहाड़ी के ऊपर बना क्रिकेट का मैदान है जिसे विश्व का सब से ऊंचाई वाला स्टेडियम माना जाता है.

कुफरी : यहां की खूबसूरती देखते ही बनती है. यह स्थान शिमला से 16 किलोमीटर दूर 2,510 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां पर कई तरह के बर्फ के खेल खेले जाते हैं. पर्यटकों के लिए यहां स्कीइंग की विशेष व्यवस्था है.

शिमला में जाखू पहाड़ी

जाखू पहाड़ी : यह शिमला से 2 किलोमीटर दूर है जो 2,455 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां से सूर्योदय का दृश्य अत्यंत खूबसूरत दिखाई देता है.

शिमला में तत्तापानी

तत्तापानी : शिमलामनाली मार्ग पर बरास्ता नालदेहरा सड़क पर स्थित तत्तापानी में गरम पानी के झरने हैं, जिन का पानी सल्फर मिश्रित है.

शिमला में चाडविक फौल्स

चाडविक फौल्स : शिमला से 7 किलोमीटर दूर 1,586 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह झरना पर्यटकों को खास आकर्षित करता है. अगर आप को पैदल घूमने का शौक है तो समर हिल चौक से लगभग 45 मिनट की पैदल दूरी से यहां पहुंचा जा सकता है. यह हरीभरी झाडि़यों से घिरा एक आकर्षक झरना है. इस झरने की संगीतमय मनमोहक ध्वनि सैलानियों के दिलोदिमाग में ताजगी भर देती है. यहां सैलानी प्रकृति के विभिन्न रूपों से रूबरू होते हैं.

शिमला में नारकंडा

नारकंडा : हिंदुस्तानतिब्बत मार्ग पर स्थित नारकंडा के बर्फ से ढकी पर्वत शृंखला के सुंदर दृश्य देखे जा सकते हैं. देवदार के जंगलों से घिरा ऊपर की ओर जाता मार्ग हाटु चोटी तक जाता है.

शिमला में नालदेहरा 

नालदेहरा : यह शिमला से 23 किलोमीटर दूर 2,044 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां गोल्फ का मैदान है. अप्रैलमई का महीना इस जगह को देखने के लिए सब से अच्छा समय है. नालदेहरा पिकनिक स्पौट और घुड़सवारी के लिए भी प्रसिद्ध है.

शिमला में रामपुर

रामपुर : यह शहर सतलुज नदी के किनारे स्थित है. यह एक बड़ा वाणिज्यिक केंद्र है जो प्रतिवर्ष नवंबर में आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय लाबी मेले के लिए प्रसिद्ध है.

शिमला कसौली

कसौली : कालकाशिमला मार्ग पर स्थित कसौली काफी खूबसूरत है. कसौली में कई दर्शनीय स्थल हैं जहां प्राकृतिक सौंदर्य का नजारा देखा जा सकता है. बलूत, चीड़ और घोड़ों के लिए बनी सुरंगों से संपूर्ण क्षेत्र अत्यंत खूबसूरत लगता है.

शिमला में क्या खरीदें

शिमला घूमने जाएं और वहां से खरीदारी न करें, भला ऐसा कैसे हो सकता है. शिमला में लोअर बाजार, लक्कड़ बाजार और तिब्बतियन बाजार से खरीदारी की जा सकती है. लक्कड़ बाजार में लकड़ी से बने खिलौने पर्यटकों को खूब लुभाते हैं. इस बाजार में लकड़ी की बनी स्थानीय हैंडीक्राफ्ट की कई चीजें सस्ते दामों पर मिलती हैं. यहां लकड़ी के टेबल व बौक्स, हैंडीक्राफ्ट ज्वैलरी के अलावा ऊनी कपड़े व शौल भी अच्छी क्वालिटी के मिलते हैं. इन बाजारों से आप हिमाचली टोपी भी याद के तौर पर खरीद सकते हैं. यहां के बाजारों में खरीदारी करते समय मोलभाव करना न भूलें.

शिमला कैसे जाएं

मण्डी हिमाचल प्रदेश के केंद्र में एक छोटा सा कस्बा है जहां अधिकांशतः लोग दिल्ली अथवा चंडीगढ़ होकर पहुंचते हैं। यहां पहुंचने के ये दो विकल्प हैं।

शिमला की यात्रा दिल्ली से

दिल्ली पहुंचने पर अंतर्राज्यीय बस अड्डा (आईएसबीटी) कश्मीरी गेट जाएं, वहां से मनाली अथवा मण्डी जाने वाली बसें प्लेटफॉर्म संख्या 6-8 से चलती हैं । दिल्ली से मण्डी की दूरी 475 कि.मी. है जिसे बस द्वारा लगभग 12 घंटे में ( यह सड़कों पर यातायात एवं अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है ) तय किया जा सकता है । यदि कोई निजी वाहन या कार/जीप से आने की योजना बनाता है तो यह समय 12 घंटे से कम भी लग सकता है। दिल्ली से विभिन्न प्रकार की सुविधाओं से युक्त जैसे साधारण, डीलक्स, एवं वातानुकूलित बसें चलती हैं जिनका विवरण हिमाचल पथ परिवहन निगम की वेबसाइट hrtc.gov.in से प्राप्त किया जा सकता है। मण्डी आने के लिए अन्य राज्यों की बसें तथा निजी बसें भी उपलब्ध रहती हैं।

मण्डी पहुंचने के लिए दिल्ली से एक विकल्प यह भी है कि रेलमार्ग से कीरतपुर साहिब तक दिल्ली-ऊना हिमाचल एक्सप्रेस (4553) से पहुंचें तथा कीरतपुर से सड़क मार्ग के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। यद्यपि कीरतपुर से बसों की आवाजाही अच्छी हो सकती है किंतु उसकी विस्तृत जानकारी हमें उपलब्ध नहीं है। दिल्ली एवं चंडीगढ़ से मण्डी जाने वाली सभी बसें कीरतपुर होकर गुजरती हैं।

शिमला की यात्रा चंडीगढ़ से

चंडीगढ़ से भी मण्डी एवं मनाली के लिए बसें मिलती हैं। चंडीगढ़ से बसों की आवाजाही अच्छी हैं क्योंकि दिल्ली से आने वाली बसें भी चंडीगढ़ होकर गुजरती हैं तथा कुछ बसें चंडीगढ़ से भी शुरु होती हैं। चंडीगढ़ से मण्डी तक की यात्रा के लिए टैक्सी का भी विकल्प है। चंडीगढ़ एवं मण्डी के बीच की दूरी 200 किमी. है जिसे लगभग 6 घंटे में बस तथा टैक्सी से 5 घंटे में तय किया जा सकता है।

शिमला की यात्रा वायुमार्ग से

मण्डी कस्बे से सबसे नजदीक लगभग 75 किमी. की दूरी पर भुंतर में कुल्लू हवाई अड्डा है। यह घरेलू हवाई अड्डा बड़े जहाजों के लिए उपयुक्त नहीं है अतः यहां कुल्लू में दिल्ली एवं शिमला से सीमित संख्या में छोटे जहाज ही आते जाते हैं और कुल्लू के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय अथवा देश के अन्य बड़े शहरों से उड़ान नहीं है। वायुमार्ग से मण्डी आने के इच्छुकों को पहले दिल्ली आना होगा जो कि देश-विदेश के महत्वपूर्ण स्थानों से वायुमार्ग से जुड़ी है। दिल्ली से मण्डी आने के लिए यात्रियों को कुल्लू की फ्लाइट लेनी होती है, यह यात्रा लगभग 90 मिनट की है। कुल्लू के लिए दो वायुसेवा प्रदाता कंपनियां है- इंडियन एयर लाइंस तथा किंगफिशर एयर लाइंस जिसमें किंगफिशर की ज्यादा और प्रतिदिन उड़ानें हैं जो कि कभी-कभी वर्षा ऋतु में खराब मौसम के कारण परिस्थितवश विलंब से चलती हैं अथवा रद्द भी हो सकती हैं।

सड़क मार्ग: शिमला, दिल्ली से 600 किलोमीटर की दूरी पर है। यह शिमला से सीधे सड़क मार्ग से जुड़ा है। दिल्ली से शिमला व चंडीगढ़ से से के लिए हिमाचल परिवहन निगम की बसें उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग: यहां के लिए सीधी रेल सुविधा उपलब्ध नहीं है। निकटतम रेलवे स्टेशन चंडीगढ़ है। चंडीगढ़ से से 260 किलोमीटर दूर है। आप शिमला  पहुंच सकते हैं। पिंजौर तक रेल द्वारा जाया जा सकता है।

वायु मार्ग: शिमला में हवाई यात्रा का भी प्रबंध है यहाँ का हवाई अड्डा जब्बरहट्टी में है, जो मेन शहर से 23 कि.मी. दुरी पर स्थित है।

 

हिमाचल प्रदेश कृषि

हिमाचल प्रदेश का प्रमुख व्यवसाय कृषि है। कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कृषि से 69 प्रतिशत कामकाजी नागरिकों को सीधा काम मिलता है। कृषि और उसके सहायक क्षेत्र से प्राप्त आय प्रदेश के कुल घरेलू उत्पादन का 22.1 प्रतिशत है। कुल भूमि क्षेत्र 55.673 लाख हेक्टेयर में से 9.79 लाख हेक्टेयर भूमि के स्वामी 9.14 लाख किसान हैं। मध्यम और छोटे किसानों के पास कुल भूमि का 86.4 प्रतिशत भाग है। राज्य में कृषि भूमि केवल 10.4 प्रतिशत है। लगभग 80 प्रतिशत भूमि वर्षा द्वारा सिंचित है और किसान इंद्र देवता की कृपा पर निर्भर रहते हैं। वर्ष 2006-07 में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 16 लाख मिलियन टन रहा ।
धनकर झील, हिमाचल प्रदेश
बागवानी

प्रकृति द्वारा हिमाचल प्रदेश को व्यापक रूप से कृषि के अनुकूल जलवायु और परिस्थितियां दी हैं जिसके कारण किसानों को विविध फल उगाने में मदद मिलती है। बागवानी के प्रमुख फल हैं- सेब, नाशपाती, आडू, बेर, खुमानी, गुठली वाले फल, नीबू, आम, लीची, अमरुद और झरबेरी आदि। 1950 में केवल 792 हेक्टेयर क्षेत्र बागवानी के अंतर्गत था, जो बढ़कर 2.23 लाख हेक्टेयर हो गया है। 1950 में फल उत्पादन 1200 मीट्रिक टन था, जो 2007 में बढकर 6.95 लाख टन हो गया है। फल उद्योग से लगभग 2200 करोड़ रुपये की घरेलू वार्षिक आय होती है। दसवीं पंचवर्षीय योजना में राज्य में बागवानी के विकास के लिए टेक्नोलॉजी मिशन 80 करोड़ रुपये की कुल लागत के साथ स्थापित किया जा रहा है। इस मिशन से राज्य में बागवानी विकास की सभी संभावनाओं का पता लगाया जाएगा। इस योजना में विभिन्न जलवायु वाले कृषि क्षेत्रों में चार उत्कृष्टता केंद्र बनाए जाएंगे और जल संरक्षण, ग्रीन हाउस, कार्बनिक कृषि और कृषि तकनीकों से जुड़ी सभी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।

हिमाचल प्रदेश शिक्षा

 पुस्तकालय, शिमला

हिमाचल प्रदेश ने शिक्षा और लोक स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और संचार सुविधाओं के सुधार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। फिर भी राज्य की अधिकांश जनता जीवनयापन के स्तर पर ही है और राज्य के विशाल प्राकृतिक संसाधनों का योजनाबद्ध रूप से दोहन होना अभी बाक़ी है। 1970 में शिमला में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही प्रदेश में उच्च शिक्षा संभव हो सकी। इस विश्वविद्यालय से 50 से अधिक महाविद्यालय संबद्ध हैं। शिमला में एक चिकित्सा महाविद्यालय, पालमपुर में एक कृषि विश्वविद्यालय और सोलन के निकट एक बाग़बानी और वन विश्वविद्यालय भी है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी (शिमला) और सेंट्रल रिसर्च इस्टिट्यूट (कसौली) में शोध कार्य होता है। 960 के दशक के बाद के वर्षों से प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के विद्यालयों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, इसी के अनुरूप इनमें दाख़िला लेने वालों की संख्या भी बढ़ी। हमीरपुर में एक अभियांत्रिकी महाविद्यालय भी है।

हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम

हिमाचल प्रदेश प्रमुख शिक्षण संस्थान

  1. चौधरी स्‍वर्ण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्‍वविद्यालय
  2. परमार उद्यानकृषि एवं वानिकी विश्‍वविद्यालय
  3. हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय
  4. जे पी सूचना प्रौद्योगिकी विश्‍वविद्यालय
  5. राष्‍ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान (मानद विश्‍वविद्यालय)

हिमाचल प्रदेश परिवहन

हिमाचल प्रदेश राज्य में सड़कें ही यहाँ की जीवन रेखा हैं और यही संचार के प्रमुख साधन हैं। इसके 55,673 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में से 36,700 किलोमीटर में रहने योग्य स्थान है, जिसमें से 16,807 गांव अनेक पर्वतीय शृंखलाओं और घाटियों के ढलानों पर फैले हुए हैं। उत्पादन क्षेत्रों और बाज़ार केंद्रों को जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण सड़कों के निर्माण के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार ने तीन वर्षों में प्रत्येक पंचायत को सड़क से जोड़ने का निर्णय किया है। यह राज्य जब1948 में बना, तो यहाँ पर केवल 288 किमी लंबी सड़कें थीं जिनको 15 अगस्त 2007 तक बढ़ाकर 30,264 किमी तक विकसित कर दिया गया है।

हिमाचल प्रदेश जैव प्रौद्योगिकी

जैव प्रौद्योगिकी के लिए राज्य में जैव-प्रौद्योगिकी के दोहन पर विशेष विकास किया जा रहा है। इसके विकास के लिए अलग से जैव-प्रौद्योगिकी विभाग खोल दिया गया है। राज्य की अपनी जैव-प्रौद्योगिकी नीति है। सरकार की ओर से जैव प्रौद्योगिकी इकाइयों को रियायतें दी जा रही हैं जो अन्य औद्योगिकी इकाइयों को दी जाती हैं। राज्य सरकार का सोलन ज़िले में जैव-प्रौद्योगिकी पार्क की स्थापना का विचार है।
सिंचाई और जलापूर्ति

वर्ष 2007 तक हिमाचल प्रदेश में कुल कृषि क्षेत्र 5.83 लाख हेक्टेयर था। गांवों में पीने के पानी की सुविधा दी गई है और राज्य में 14,611 हैंडपंप लग चुके हैं। जल आपूर्ति और सिंचाई व्यवस्था में सुधार के लिए राज्य सरकार 339 करोड़ रूपए की लागत से ‘वाश’ परियोजना चला रही है। इस परियोजना में सिंचाई और पीने के पानी के लिए जी.डी.जेड. सहयोग दे रही है।

हिमाचल प्रदेश वानिकी विकाश 

राज्य का कुल क्षेत्रफल 55,673 वर्ग किलोमीटर है। रिकार्ड के अनुसार कुल वन क्षेत्र 37,033 वर्ग किलोमीटर है। इसमें लगभग 16,376 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पहाड़ी वनस्पतियां नहीं उगाईं जा सकतीं क्योंकि यह क्षेत्र स्थायी रूप से बर्फ़ से ढका रहता है। उपयोग में आने वाला वन क्षेत्र 20,657 वर्ग किलोमीटर है। राज्य सरकार परियोजनाओं के द्वारा अधिकतम क्षेत्र को हरित क्षेत्र बनाने कि लिए प्रयास चल रहे हैं।
चंबा घाटी
इन योजनाओं के लिए सरकार अपनी योजनाओं के साथ साथ भारत सरकार की योजनाओं और बाह्य सहायता से चल रही योजनाओ को क्रियान्वित कर रही है। विश्व बैंक ने हिमालय में जलाशय विकास योजना के लिए 365 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। इस परियोजना को अगले छ: वर्षों में 10 ज़िलों के 42 विकास खंडों की 545 पंचायतों में चलाया जाएगा। राज्य में 2 राष्ट्रीय पार्क तथा 32 वन्यजीवन अभयारण्य हैं। वन्यजीवन अभयारण्य के अंतर्गत कुल क्षेत्र 5,562 किमी, राष्ट्रीय पार्क के अंतर्गत 1,440 किमी क्षेत्र है। इस प्रकार कुल संरक्षित क्षेत्र 7,002 किमी है।

हिमाचल प्रदेश पर्यटन – रिवालसर झील, मंडी

हिमाचल प्रदेश में पर्यटन उद्योग को उच्च प्राथमिकता दी गई है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने विकास के लिए सुनियोजित विकास किया है जिसमें जनोपयोगी सेवाएं, सड़कें, संचार तंत्र, हवाई अड्डे, यातायात सेवाएं, जलापूर्ति और जन स्वास्थ्य सेवाओं को शामिल किया है। राज्य सरकार राज्य को ‘हर हाल में गंतव्य’ का रूप देने के लिए प्रतिबद्ध है। राज्य पर्यटन विकास निगम की आय में 10 प्रतिशत का योगदान करता है। यह निगम बिक्री कर, सुख-सुविधा कर और यात्री कर के रूप में 2 करोड़ वार्षिक आय का योगदान राज्य की आय में करता है। वर्ष 2007 में हिमाचल प्रदेश में 8.3 मिलियन पर्यटक आए जिनमें लगभग 2008 लाख पर्यटक विदेशी थे।

राज्य में तीर्थो और मानवशास्त्रीय महत्त्व के स्थलों का समृद्ध एवं अथाह भंडार है। इस राज्य का व्यास, पाराशर, वसिष्ठ, मार्कण्डेय और लोमश आदि ऋषि मुनियों का स्थल होने का गौरवपूर्ण पौराणिक इतिहास है, साथ ही गर्म पानी के स्रोत, ऐतिहासिक दुर्ग, प्राकृतिक तथा मानव निर्मित झीलें, उन्मुक्त घूमते चरवाहे पर्यटकों को असीम सुख और आनंद प्रदान करते हैं। राज्य सरकार पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए निजी क्षेत्रों को योजनाओं में शामिल करके पर्यटन संबंधी विकास इस तरह कर रही है कि राज्य की प्राकृतिक स्थिति और पर्यावरण अक्षुण्ण बना रहे। साथ ही रोज़गारों का सृजन हो और पर्यटन का विकास हो। पर्यटकों के प्रवास की अवधि बढ़ाने के लिए गतिविधियों पर आधारित पर्यटन का विकास विशेष रूप से किया जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश का इतिहास

हिमाचल प्रदेश का इतिहास उस समय में ले जाता है जब सिन्धु घाटी सभ्यता विकसित हुई। इस बात की सत्यता के प्रमाण हिमाचल प्रदेश के विभिन्न भागों में हुई खुदाई में प्राप्त सामग्रियों से मिलते हैं। प्राचीनकाल में इस प्रदेश के आदि निवासी दास, दस्यु और निषाद के नाम से जाने जाते थे। जनवरी, 1948 ई. में शिमला हिल्स स्टेट्स यूनियन सम्मेलन सोलन में हुआ। 15 अप्रैल 1948 ई. को हिमाचल प्रदेश राज्य का निर्माण किया था। उस समय प्रदेश भर को चार जिलों में बांटा गया और पंजाब हिल स्टेट्स को पटियाला और पूर्व पंजाब राज्य का नाम दिया गया।

हिमाचल प्रदेश का राज्य पशु, पक्षी और फूल

हमारे भारत में राष्ट्रीय पशु चीता ,राष्ट्रीय पक्षी मोर और राष्ट्रीय फूल कमल है. इसी प्रकार भारत के हर राज्य का अपना- अपना राज्य पशु ,पक्षी और फूल हैं. भारत के कई राज्यों में क्षेत्र के हिसाब से अपना अलग जलवायु,कृषि और वन्य जीवन है तथा इसके साथ साथ वहां की वनस्पति भी अलग है. कई पशु और पौधे एक दूसरे राज्य से मिलते जुलते हो सकते हैं. इसी प्रकार हिमाचल का राज्य पक्षी मोनाल था,राज्य पशु कस्तूरी मृग तथा राज्य फूल बुरांस का फूल था. अब यह सब तीसरी राज्य वन्य जीव बोर्ड की बैठक में निम्नलिखित के अनुसार बदल दिए गए हैं.

हिमाचल प्रदेश राज्य का पक्षी : जजुराना

इसी प्रकार हिमाचल का राज्य पक्षी मोनाल था,राज्य पशु कस्तूरी मृग तथा राज्य फूल बुरांस का फूल था.अब यह सब तीसरी राज्य वन्य जीव बोर्ड बैठक में निम्नलिखित के अनुसार बदल दिए गए हैं.हिमाचल प्रदेश में मोनाल की जगह अब पश्चमी जाजुराना राज्य पक्षी ने ले ली है.इसका वैज्ञानिक नाम “Tragopan melanocephalus”मोनाल पक्षी उतराखण्ड राज्य का राज्य पक्षी और नेपाल का राष्ट्रीय पक्षी है इसी कारण हिमाचल प्रदेश के लिए किसी नई प्रजाति के पक्षी की जरूरत महसूस हुई.जाजुराना नामक इस पक्षी का चयन उसकी सुन्दरता के आधार पर हुआ तथा इसलिए भी इसे तरजीह दी गई क्योंकि ये पक्षी हिमाचल प्रदेश में कम संख्या में हैं.

हिमाचल प्रदेश का राज्य पशु : हिम तेंदुआ

हिमाचल प्रदेश का राज्य पशु अब बर्फानी तेंदुआ है. इससे पहले का राज्य पशु कस्तूरी मृग था. यह हिमाचल क्षेत्र में सब जानवरों से खतरनाक माना जाता है. यह केवल ऊंचे इलाके जहाँ भारी मात्रा में बर्फ पडती है पाया जाता है. बर्फानी तेंदुआ ठन्डे वातावरण को अपने अनुकूल बनाने में सक्षम है.
इसका शरीर गठीला होता है, खाल मोटी तथा कान छोटे और गोलाकार होते हैं जो उन्हें गर्मी में राहत प्रदान करती है. बर्फानी तेंदुए की पूँछ लम्बी और लचीली होती है. यह चट्टानी इलाके में इस पशु की सहायक होती है.

हिमाचल प्रदेश का राज्य फूल : गुलाबी बुरांस

हिमाचल प्रदेश का राज्य फूल पहले साधारण बुरांस था लेकिन अब इसकी जगह गुलाबी बुरांस ने ले ली है. यह फूल ऊंचे तथा ठन्डे जलवायु वाले स्थान में पाया जाता है. बहुत ही सुन्दर फूल होता है तथा इसके गुलाबी पत्ते होते हैं. इसका वैज्ञानिक नाम “Rhododendron campanulatum.” है.  Click Here and book Best of Himachal Tour at lowest price

हिमाचल प्रदेश एक नजर में

हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) की स्थापना25 जनवरी, 1971 को हुई थी
हिमाचल प्रदेश का शाब्दिक अर्थ “बर्फ़ीले पहाड़ों का प्रांत” है
हिमाचल प्रदेश का क्षेञफल55,673 वर्ग किमी है
प्रदेश में जिलों की संख्या 12 है
यहाॅ के सबसे बडे शहर शिमला (Shimla), कुल्लू (Kullu), और कांगडा (Kangra) है
यहॉ की प्रमुख फसलें गेहॅू, चावल, मक्का, दालें, चाय, व फल है
प्रदेश का राजकीय पक्षी मोनाल है
प्रदेश का राजकीय पशु कस्तूरी मृग है
प्रदेश का राजकीय फूल कमल है
प्रदेश का राजकीय पेड पीपल है
प्रदेश में साक्षरता दर लगभग 83.78 प्रतिशत है
हिमाचल प्रदेश का प्रमुख व्यवसाय कृषि है। कृषि राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है
राज्य की प्रमुख भाषाओं में हिन्दी, काँगड़ी, पहाड़ी, पंजाबी और मंडियाली शामिल हैं
हिमाचल प्रदेश में पांच नदियॉ बहती हैं
हिमाचल प्रदेश में केवल विधानसभा है जिसकी सदस्य की संख्या 68 है यहॉ लोकसभा की 4 तथा राज्य सभा की 3 सीटें हैं
हिमाचल प्रदेश के उच्च न्यायालय की स्थापना 1971 में की गयी थी
प्रदेश में सडकों की लम्बाई लगभग 36264 किमी है
हिमाचल प्रदेश में दो राष्ट्रीय उद्यान ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (Great Himalayan National Park) और नेशनल पार्क पिन वैली (Pin Valley National Park) हैं
हिमाचल प्रदेश में केवल दो रेल मार्ग पठान कोट-जोगिन्दर नगर और शिमला-कालका हैं
यहॉ मनाये जाने वाले पर्वों में शिमला समर फेस्टिवल, लोहडी, होली, बसन्त पंचमी, शिवराञि, नलवारी फेयर, बैसाखी, प्रमुख हैं

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