लोहड़ी के त्यौहार का इतिहास एवं महत्व – मकर संक्रांति पर्व

लोहड़ी 2017 स्पेशल

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क्या आप लोहड़ी के त्यौहार का इतिहास एवं महत्व से परिचित हैं

जनवरी महीना पुरे भारत वर्ष के लिए त्योहार लेकर आता है। उत्तर भारत में पंजाबी समुदायलोहरी, दक्षिण भारत के लोग पोंगल और असम में बिहू पर्व मनाया जाता है।जबकि समस्त भारत के लोग मकर संक्रांति पर्व मानते है। इस तरह नया साल सबके जीवन में ढेर सारी खुशिया लेके आता है। इस तरह लोहरी की कथा सम्पन्न हुई।

पंजाब समेत उत्तर भारत में शुक्रवार को लोहड़ी का त्यौहार मनाया जा रहा है। इस त्यौहार पर लोग ढोल-नगाड़ों की धुन पर डांस मस्ती करते हैं। लोहड़ी के दिन शाम के समय लकड़ियों की ढेरी बना कर उसमें सूखे उपले रखकर विशेष पूजन के साथ लोहड़ी जलाई जाती है। तिल, गुड़, रेवड़ी और मूंगफली, गजक का भोग लगा कर लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है। ऐसा करके सूर्य देव और अग्नि के प्रति आभार प्रकट किया जाता है ताकि उनकी कृपा से कृषि में उन्नत हो।

लोहड़ी | मकर संक्रान्ति पर्व

लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध त्योहार है। पंजाब एवं जम्मू–कश्मीर में ‘लोहड़ी’ नाम से मकर संक्रान्ति पर्व मनाया जाता है। एक प्रचलित लोककथा है कि मकर संक्रान्ति के दिन कंस ने कृष्ण को मारने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को गोकुल में भेजा था, जिसे कृष्ण ने खेल–खेल में ही मार डाला था। उसी घटना की स्मृति में लोहिता का पावन पर्व मनाया जाता है। सिन्धी समाज में भी मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व ‘लाल लाही’ के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है।

क्यों मनाया जाता लोहड़ी है?

यह त्यौहार सर्दियों के जाने और बंसत के आने का संकेत है। इसलिए लोहड़ी की रात सबसे ठंडी मानी जाती है। इस दिन पंजाब में अलग ही रौनक देखने को मिलती है। लोहड़ी को फसलों का त्यौहार भी कहते हैं क्योंकि इस दिन पहली फसल कटकर तैयार होती है। पवित्र अग्नि में कुछ लोग अपनी रवि फसलों को अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से फसल देवताओं तक पहुंचती है।

Hoppy Loheri

कैसे मनाया जाता लोहड़ी है?

इस त्यौहार को पंजाब समेत उत्तर भारत के लोग खूब मौज मस्ती के साथ मनाते हैं। जिस घर में नई शादी हुई हो या बच्चा हुआ हो उनके यहां लोहड़ी बेहद धूम धड़ाके से मनाई जाती है। कुछ लोग लोकगीत गाते हैं, महिलाएं गिद्दा करती हैं तो कुछ रेवड़ी, मूंगफली खाकर नाचते-गाते हैं। तो कहीं पूरा परिवार एक साथ मिलकर आग जलाकर, अग्निदेव से अपने परिवार की सुख शांति की कामना करता है।

संजीव भाई, स्वदेशी भारतीय संस्कृति : लोहड़ी भारतीय संस्कृति में छोटी- छोटी खुशियों का संग्रह है जिंदगी। मनुष्य ने मौसम, दिन, वातावरण, रीति- रिवाज, रिश्ते-नाते, प्यार -मोहब्बत, लगाव तथा परंपराओं आदि को ध्यान में रखते हुए हर्ष और उल्लास के अवसर के रूप में मेलों और त्योहारों का आयोजन शुरू किया। इन्हीं सब वजहों से हमारे त्योहार अस्तित्व में आए। अगर मनुष्य की जिंदगी से इन उत्सवपूर्ण दिनों को हटा दिया जाए तो उसकी सामाजिक जिंदगी बेहद नीरस और फीकी हो जाएगी।

भारत के किन राज्यो में मनाया जाता लोहड़ी है?

मैंने महाराष्ट्र ,पंजाब, हिमाचल ,उत्तराखंड ,तमिलनाडु आदि प्रान्तों का मकरसंक्रांति लोहड़ी का उत्सव देखने का अवसर मिला है ।
लोहड़ी शब्द लोही से बना है, जिसका अभिप्राय है वर्षा होना, फसलों का फूटना। एक लोकोक्ति है कि अगर लोहड़ी के समय वर्षा न हो तो खेती का नुकसान होता है। इस तरह यह त्योहार बुनियादी तौर पर मौसम के बदलाव तथा फसलों के बढ़ने से जुड़ा है। इस समय तक किसान हाड़ कंपाने वाली सर्दी में अपने जुताई-बुवाई जैसे सारे फसली काम कर चुके होते हैं। अब सिर्फ फसलों के बढ़ने और उनके पकने का इंतजार करना होता है। इसी समय से सर्दी भी घटने लगती है। इसलिए किसान इस त्योहार के माध्यम से इस सुखद, आशाओं से भरी परिस्थितियों को सेलिब्रेट करते हैं। पंजाब कृषि प्रधान राज्य है, वहां लोढ़ी किसानों, जमींदारों एवं मजदूरों की मेहनत का पर्याय है। वहां इसे सबसे ज्यादा धूमधाम से मनाते हैं।

लोहड़ी माघ महीने की संक्रांति से पहली रात को मनाई जाती है। किसान सर्द ऋतु की फसलें बो कर आराम फरमाता है। इस दिन प्रत्येक घर में मूंगफली, रेवड़ियां, चिवड़े, गजक, भुग्गा, तिलचौली, मक्की के भुने दाने, गुड़, फल इत्यादि खाने और बांटने के लिए रखे जाते हैं। गन्ने के रस की खीर बनाई जाती है और उसे दही के साथ खाया जाता है। ये सारी चीजें इसी मौसम की उपज होती हैं और अपनी तासीर से शरीर को गर्मी पहुंचाती हैं।

इस दिन घरों के आंगनों, संस्थाओं, गलियों, मुहल्लों, बाजारों में खड़ी लकड़ियों के ढेर बना कर या उपलों का ढेर बना कर उस की आग जलाते हैं और उसे सेंकने का लुत्फ लेते हैं। चारों ओर बिखरी सर्दी तथा रुई की भांति फैली धुंध में आग सेंकने और उसके चारों ओर नाचने-गाने का अपना ही आनंद होता है। लोग इस आग में भी तिल इत्यादि फेंकते हैं। घरों में पूरा परिवार बैठकर हर्ष की अभिव्यक्ति के लिए गीत गायन करता है। देर रात तक ढोलक की आवाज, ढोल के फड़कते ताल, गिद्दों-भंगड़ों की धमक तथा गीतों की आवाज सुनाई देती रहती है। रिश्तों की सुरभि तथा आपसी प्यार का नजारा चारों ओर देखने को मिलता है। एक संपूर्ण खुशी का आलम।

लोहड़ी का त्यौहार

लोहड़ी का त्यौहार

मकरसंक्रांति की दंतकथाएं

इस त्योहार से कुछ दंतकथाएं भी आ जुड़ी हैं। एक कहानी यह है कि दुल्ला भट्टी नाम का एक मशहूर डाकू था। उसने एक निर्धन ब्राह्माण की दो बेटियों -सुंदरी एवं मुंदरी को जालिमों से छुड़ा कर उन की शादियां कीं तथा उन की झोली में शक्कर डाली। इसका एक संदेश यह है कि डाकू हो कर भी उसने निर्धन लड़कियों के लिए पिता का फर्ज निभाया। दूसरा संदेश यह है कि यह इतनी खुशी और उमंग से भरा त्योहार है कि कोई चोर- डकैत जैसा भी अपनी गलत आदतें छोड़ कर दूसरों की खुशी के लिए आगे बढ़ कर आ जाता है।

लोहड़ी के दूसरे दिन ‘माघी’ का पवित्र त्योहार मनाया जाता है। माघ माह को शुभ समझा जाता है। ठिठुरती सर्दी में रजाई का आनंद इसी महीने आता है। इस मौसम में चावल की खिचड़ी, सरसों का साग, मक्की की रोटी और मक्खन खाने का भी रिवाज है, जो शरीर की अनुकूलता से संबंधित है।

‘ माघी’ का मेला अनेक शहरों में मनाया जाता है, खास कर मुक्तसर (पंजाब) में। सिखों के पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव जी ने माघ माह की ‘बारह माह बाणी’ में प्रशंसा की है। माघ से लेकर बाद का छह माह का समय ‘उत्तरायणम’ कहलाता है, जिस में ब्रह्मा को जानने वाले लोग प्राणों का त्याग कर मुक्त हो जाते हैं। प्रयाग तीर्थ में महात्मा लोग प्रकल्प करते हैं। लोहड़ी का त्योहार सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है।
लोहड़ी किसके लिए है खास क्या क्या परम्पराये कहानियां जुडी है इस त्यौहार से आज जाने उनको ।

लोहड़ी का त्योहार 13 जनवरी को मनाया जाएगा। शादी के बाद जिनकी पहली लोहड़ी होती है या जिनके घर संतान का जन्म होता है उनके लिए लोहड़ी का त्योहार बड़ा खास होता है।

लोहड़ी को सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का स्वागत पर्व भी माना जाता है। यह त्योहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल एवं कश्मीर में धूम धाम से मनाया जाता है।

लोहड़ी लोक कथाएँ

लोहड़ी लोक कथाएँ

लोहड़ी लोककथाएँ

लोहड़ी से संबद्ध परंपराओं एवं रीति-रिवाजों से ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक गाथाएँ भी इससे जुड़ गई हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में ही यह अग्नि जलाई जाती है। लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता हैं। दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था। उस समय संदल बार के जगह पर लड़कियों को ग़ुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न केवल मुक्त ही करवाया बल्कि उनकी शादी भी हिन्दू लड़कों से करवाई और उनके शादी की सभी व्यवस्था भी करवाई। दुल्ला भट्टी एक विद्रोही था और जिसकी वंशावली भट्टी राजपूत थे। उसके पूर्वज पिंडी भट्टियों के शासक थे जो कि संदल बार में था। अब संदल बार पाकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था।
अग्नि का पूजन

जैसे होली जलाते हैं, उसी तरह लोहड़ी की संध्या पर होली की तरह लकड़ियाँ एकत्रित करके जलायी जाती हैं और तिलों से अग्नि का पूजन किया जाता है। इस त्योहार पर बच्चों के द्वारा घर–घर जाकर लकड़ियाँ एकत्र करने का ढंग बड़ा ही रोचक है। बच्चों की टोलियाँ लोहड़ी गाती हैं, और घर–घर से लकड़ियाँ माँगी जाती हैं। वे एक गीत गाते हैं, जो कि बहुत प्रसिद्ध है —

सुंदर मुंदरिये ! ………………हो
तेरा कौन बेचारा, ……………..हो
दुल्ला भट्टी वाला, ……………हो
दुल्ले घी व्याही, ………………हो
सेर शक्कर आई, ……………..हो
कुड़ी दे बाझे पाई, ……………..हो
कुड़ी दा लाल पटारा, ……………हो
यह गीत गाकर दुल्ला भट्टी की याद करते हैं।
इस दिन सुबह से ही बच्चे घर–घर जाकर गीत गाते हैं तथा प्रत्येक घर से लोहड़ी माँगते हैं। यह कई रूपों में उन्हें प्रदान की जाती है। जैसे तिल, मूँगफली, गुड़, रेवड़ी व गजक। पंजाबी रॉबिन हुड दूल्हा भट्टी की प्रशंसा में गीत गाते हैं। दूल्हा भट्टी अमीरों को लूटकर, निर्धनों में धन बाँट देता था। एक बार उसने एक गाँव की निर्धन कन्या का विवाह स्वयं अपनी बहन के रूप में करवाया था।
लोहड़ी का पर्व मनाते लोग

happy Lohri

शीत ऋतु और अलाव

 

इस दिन शीत ऋतु अपनी चरम सीमा पर होती है। तापमान शून्य से पाँच डिग्री सेल्सियस तक होता है तथा घने कोहरे के बीच सब कुछ ठहरा सा प्रतीत होता है। लेकिन इस शीत ग्रस्त सतह के नीचे जोश की लहर महसूस की जा सकती है। विशेषकर हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश में लोग लोहड़ी की तैयारी बहुत ही ख़ास तरीके से करते हैं। आग के बड़े–बड़े अलाव कठिन परिश्रम के बाद बनते हैं। इन अलावों में जीवन की गर्म-जोशी छिपी रहती है। क्योंकि अब समय रबी (शीत) की फ़सल काटने का होता है। विश्राम व हर्ष की भावना को लोग रोक नहीं पाते हैं। लोहड़ी पौष मास की आख़िरी रात को मनायी जाती है। कहते हैं कि हमारे बुज़ुर्गों ने ठंड से बचने के लिए मंत्र भी पढ़ा था। इस मंत्र में सूर्यदेव से प्रार्थना की गई थी कि वह इस महीने में अपनी किरणों से पृथ्वी को इतना गर्म कर दें कि लोगों को पौष की ठंड से कोई भी नुक़सान न पहुँच सके। वे लोग इस मंत्र को पौष माह की आख़िरी रात को आग के सामने बैठकर बोलते थे कि सूरज ने उन्हें ठंड से बचा लिया।
मकर संक्रान्ति और लोहड़ी

हिन्दू पंचांग के अनुसार लोहड़ी जनवरी मास में संक्रान्ति के एक दिन पहले मनाई जाती है। इस समय धरती सूर्य से अपने सुदूर बिन्दु से फिर दोबारा सूर्य की ओर मुख करना प्रारम्भ कर देती है। यह अवसर वर्ष के सर्वाधिक शीतमय मास जनवरी में होता है। इस प्रकार शीत प्रकोप का यह अन्तिम मास होता है। पौष मास समाप्त होता है तथा माघ महीने के शुभारम्भ उत्तरायण काल (14 जनवरी से 14 जुलाई) का संकेत देता है। श्रीमद्भागवदगीता के अनुसार, श्रीकृष्ण ने अपना विराट व अत्यन्त ओजस्वी स्वरूप इसी काल में प्रकट किया था। हिन्दू इस अवसर पर गंगा में स्नान कर अपने सभी पाप त्यागते हैं। गंगासागर में इन दिनों स्नानार्थियों की अपार भीड़ उमड़ती है। उत्तरायणकाल की महत्ता का वर्णन हमारे शास्त्रकारों ने अनेक ग्रन्थों में किया है।
अलाव जलाने का शुभकार्य

सूर्य ढलते ही खेतों में बड़े–बड़े अलाव जलाए जाते हैं। घरों के सामने भी इसी प्रकार का दृश्य होता है। लोग ऊँची उठती अग्नि शिखाओं के चारों ओर एकत्रित होकर, अलाव की परिक्रमा करते हैं तथा अग्नि को पके हुए चावल, मक्का के दाने तथा अन्य चबाने वाले भोज्य पदार्थ अर्पित करते हैं। ‘आदर आए, दलिदर जाए’ इस प्रकार के गीत व लोकगीत इस पर्व पर गाए जाते हैं। यह एक प्रकार से अग्नि को समर्पित प्रार्थना है। जिसमें अग्नि भगवान से प्रचुरता व समृद्धि की कामना की जाती है। परिक्रमा के बाद लोक मित्रों व सम्बन्धियों से मिलते हैं। शुभकामनाओं का आदान–प्रदान किया जाता है तथा आपस में भेंट बाँटी जाती है और प्रसाद वितरण भी होता है। प्रसाद में पाँच मुख्य वस्तुएँ होती हैं – तिल, गजक, गुड़, मूँगफली तथा मक्का के दाने। शीतऋतु के विशेष भोज्य पदार्थ अलाव के चारों ओर बैठकर खाए जाते हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण व्यंजन है, मक्के की रोटी और सरसों का हरा साग।
संगीत और भांगड़ा
लोहड़ी

जनवरी की तीखी सर्दी में जलते हुए अलाव अत्यन्त सुखदायी व मनोहारी लगते हैं। सभी लोग रंग-बिरंगे वस्त्रों में बन ठन के आते हैं। पुरुष पजामा व कुरता पहनते हैं। कुरते के ऊपर जैकेट पर शीशे के गोल विन्यास होते हैं। जिनके चारों ओर गोटा लगा होता है। इसी से मेल खाती बड़ी–बड़ी पगड़ियाँ होती हैं। सज–धजकर पुरुष अलाव के चारों ओर एकत्रित होकर भांगड़ा नृत्य करते हैं। चूँकि अग्नि ही इस पर्व के प्रमुख देवता हैं, इसलिए चिवड़ा, तिल, मेवा, गजक आदि की आहूति भी स्वयं अग्निदेव को चढ़ायी जाती है। भांगड़ा नृत्य आहूति के बाद ही प्रारम्भ होता है। नगाड़ों की ध्वनि के बीच यह नृत्य एक लड़ी की भाँति देर रात तक चलता रहता है तथा लगातार नए नृत्य समूह इसमें सम्मिलित होते हैं। पारम्परिक रूप से स्त्रियाँ भांगड़े में सम्मिलित नहीं होती हैं। वे अलग आँगन में अलाव जलाती हैं तथा सम्मोहक गिद्दा नृत्य प्रस्तुत करती हैं।
माघी का दिन

माघ मास का आगमन इसी दिन लोहड़ी के ठीक बाद होता है। हिन्दू विश्वासों के अनुसार इस शुभ दिन नदी में पवित्र स्नान कर दान दिया जाता है। मिष्ठानों प्रायः गन्ने के रस की खीर का प्रयोग किया जाता है।
पंजाब में धूम

लोहड़ी की महत्ता

विशेषतः पंजाब के लोगों के लिए लोहड़ी की महत्ता एक पर्व से भी अधिक है। पंजाबी लोग हंसी मज़ाक पसंद, तगड़े, ऊर्ज़ावान, जोशीले व स्वाभाविक रूप से हंसमुख होते हैं। उत्सव प्रेम व हल्की छेड़–छाड़ तथा स्वच्छंदता ही लोहड़ी पर्व का प्रतीक है। आधुनिक समय में लोहड़ी का दिन लोगों को अपनी व्यस्तता से बाहर खींच लाता है। लोग एक-दूसरे से मिलकर अपना सुख-दुःख बाँटते हैं। भारत के अन्य भागों में लोहड़ी के दिन को पोंगल व मकर संक्रान्ति के रूप में मनाया जाता है। ये सभी पर्व एक ही संदेश देते हैं, हम सब एक हैं। आपसी भाईचारें की भावना तथा प्रभु को धरती पर सुख, शान्ति और धन–धान्य की प्रचुरता के लिए धन्यवाद देना, यही भावनाएँ इस दिन हर व्यक्ति के मन में होती हैं।
लोहड़ी के मौके पर होलिका दहन की तरह लकड़ियों एवं उपलों ढ़ेर बनाया जाता है। शाम के समय लकड़ियों को जलाकर सभी लोग आग के चारों ओर नाचते गाते हैं।
माताएं अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर लोहड़ी की आग ताप्ती है उनका मनमानना है की इस आग से बच्चों का स्वास्थ्य सबसे बढ़िया रहता है

लोहड़ी मूंगफली और गजक

लोहड़ी मूंगफली और गजक

लोहड़ी के खाद्य ब्यञ्जन और पकवान

लोहड़ी मूंगफली और गजक

पवित्र अग्नि में लोग रवि फसलों को अर्पित करते हैं। क्योंकि इस समय रवि फसलें कटकर घर आने लगती हैं। हिन्दू शास्त्रों की मान्यता है कि, अग्नि में समर्पित की गयी सामग्री यज्ञ भाग बनकर देवताओ तक पहुंच जाती है।

लोहड़ी की पवित्र अग्नि में रेवड़ी, तिल, मूँगफली, गुड़ व गजक भी अर्पित किए जाते हैं। इस तरह से लोग सूर्य देव और अग्नि के प्रति आभार प्रकट करते हैं क्योंकि उनकी कृपा से कृषि उन्नत होती है। सूर्य और अग्नि देव से प्रार्थना की जाती है कि आने वाले साल में भी कृषि उन्नत हो और घर अन्न धन से भरा रहे।

हमारे ऋषि-मनीषी भी बताते है की लोहड़ी पर्व के नाम के विषय में भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार मकर संक्रांति की तैयारी में सभी गोकुलवासी लगे थे। इसी समय कंस ने लोहिता नामक राक्षसी को भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए भेजा लेकिन भगवान श्री कृष्ण ने लोहिता के प्राण हर लिये। इस उपलक्ष में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहरी पर्व मनाया जाता है। लोहिता के प्राण हरण की घटना को याद रखने के लिए इस पर्व का नाम लोहड़ी रखा गया।

यदि भारत की संस्कृति को कोई व्यक्ति जान गया तो सम्पूर्ण भारत को जान गया । मैं नासिक कुम्भ में इस बार गया था और काफी बिदेशी महिलाओ को देखा । सभी प्रान्तों के लोग कुम्भ ने आते है इसलिए वह सबकी फोटो ग्राफी और फ़िल्म बना रही थी विदेशी पर्यटक तभी ही हमारे उत्सवो में भारत सैर पर आते है ।
आओ अब बात करते है बिभिन्न प्रान्त कैसे जोड़ते है भारतीय संस्कृति को । कैसे कैसे मानते है इस त्यौहार मकरसंक्रांति लोहड़ी को ।
पंजाब प्रान्त सबसे मशहूर माना जाता है लोहड़ी के लिए । लोहड़ी की धूम देखनी हो तो गेहूं उत्पादन में देश में खास स्थान रखने वाले पंजाब से बेहतर भला और कौन सा प्रान्त हो सकता है। अच्छी फसल होने की खुशी में ढोल नगाड़ों पर झूमते पुरूष और रंग बिरंगे दुपट्टे लहराते हुए गिददा करती महिलाएं भारत की सांस्कृतिक विविधता में चार चांद लगा देती हैं।

कुछ लोग रोजी रोटी और व्यवसाय के सिलसिले में शहरो में रहते है लेकिन लोहड़ी का पर्व उन्हें पुराणी यादो को ताजा करने के लिए उनके गांव ले जाता है। कुछ कहते हैं गेहूं की फसल अक्टूबर में बोई जाती है और मार्च अप्रैल तक पक कर तैयार हो जाती है। लेकिन जनवरी में संकेत मिल जाता है कि फसल अच्छी हो रही है या नहीं। अच्छी फसल का संकेत मिल जाए तो किसानों के लिए इससे बड़ा जश्न और कोई नहीं होता। यह खुशी वह लोहड़ी में जाहिर करते हैं।
इस पर्व के दौरान किसान यह कह कर सूर्य भगवान का आभार व्यक्त करते हैं कि उनकी गर्मी से अच्छी फसल हुई। इसीलिए इस पर्व का संबंध सूर्य से माना जाता है। लोहड़ी जाड़े की विदाई का भी संकेत होता है। माना जाता है कि लोहड़ी के अगले दिन से सूर्य मकर राशि यानी उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है। सूर्य की यह अवस्था 14 जनवरी से 14 जुलाई तक रहती है और इसे उत्तरायण कहा जाता है।

धारणा है कि सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान पंजाब में दुल्ला भटटी नामक एक मुस्लिम लुटेरा था जो लूट में मिले धन से गरीबों की मदद करता था। इसीलिए उसे लोग नायक मानते थे। लोहड़ी के लिए लकडियां एकत्र करते समय दुल्ला भट्टी की प्रशंसा में ही गीत गाए जाते हैं।

उन्होंने कहा एकत्र की गई लकडियां रात को जलाई जाती हैं और इसके आसपास लोग परिक्रमा करते हैं। इन लकडियों के नीचे गोबर से बनी लोहड़ी की प्रतिमा रखी जाती है। एक तरह से यह भरपूर फसल के लिए अग्नि की पूजा होती है।

कुछ बुजुर्ग कहते है कि परिक्रमा के दौरान लोग आग में तिल और सूखा गन्ना डालते हैं। परिवार के छोटे सदस्य बड़ों के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लेते हैं। नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशु के लिए इस पर्व को अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन मायके और ससुराल दोनों जगहों से उपहार मिलते हैं। नवजात शिशु को बुजुर्ग कंघा भेंट करते हैं। इस सौभाग्यसूचक माना जाता है। यह नजारा शहरों में कहां देखने मिलता है।

लोहड़ी पर पूजा के बाद गजक, गुड़, मूंगफली, फुलियां, पॉपकॉर्न का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस दिन मक्की की रोटी और सरसों का साग बनाने की परंपरा है।

चंद्रमा आधारित कैलेंडर का आखिरी महीना मारगजी लोहड़ी के दिन समाप्त हो जाता है। पहले यह पर्व केवल उत्तर भारत में मनाया जाता था लेकिन अब पूरे देश में इसकी धूम मचती है। हां, अलग अलग प्रदेशों में इसके नाम अलग अलग होते हैं। तमिलनाडु में इसे पोंगल, असम में बीहू, आंध्र प्रदेश में भोगी तथा कर्नाटक, बिहार और उत्तर प्रदेश में इसे संक्रान्ति कहा जाता है।

पंजाब हिमाचल में इस त्यौहार को जो खिचड़ी बनायीं जाती है जिसने हरे मुंग अदरख कालीमिर्च सेंधा नमक अपने खेत से धान से तैयार चावल और मिटटी की हांड़ी । और ऊपर से माँ के हाथो का घी इतना स्वाद ,अच्छा लगता है कि पूछो ही मत ।
यदि आप लोगों को सच में लोहड़ी मनानी है तो उत्तर भारत पंजाब ,हिमाचल ,हरियाणा के गाँव में ही सबसे बढ़िया है । मध्यभारत में जन्मदिन मनाने की परम्परा मुझे सबसे अच्छी लगी । इसे कहते है विविधा में एकता कभी बचपन में पढ़ते थे विविधता में एकता भारत देश में है आज हम स्वयं देख पा रहे है इन उत्सवो के माध्यमो से ।

ऐतिहासिक संदर्भ – किसी समय में सुंदरी एवं मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियां थीं जिनको उनका चाचा विधिवत शादी न करके एक राजा को भेंट कर देना चाहता था। उसी समय में दुल्ला भट्टी नाम का एक नामी डाकू हुआ है। उसने दोनों लड़कियों, ‘सुंदरी एवं मुंदरी’ को जालिमों से छुड़ा कर उन की शादियां कीं। इस मुसीबत की घडी में दुल्ला भट्टी ने लड़कियों की मदद की और लडके वालों को मना कर एक जंगल में आग जला कर सुंदरी और मुंदरी का विवाह करवाया। दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। कहते हैं दुल्ले ने शगुन के रूप में उनको शक्कर दी थी।

जल्दी-जल्दी में शादी की धूमधाम का इंतजाम भी न हो सका सो दुल्ले ने उन लड़कियों की झोली में एक सेर शक्कर डालकर ही उनको विदा कर दिया। भावार्थ यह है कि डाकू हो कर भी दुल्ला भट्टी ने निर्धन लड़कियों के लिए पिता की भूमिका निभाई।

यह भी कहा जाता है कि संत कबीर की पत्नी लोई की याद में यह पर्व मनाया जाता है. इसीलिए इसे लोई भी कहा जाता है।

लोहड़ी का इतिहास

लोहड़ी का इतिहास

देवभूमि में यहां 550 वर्ष पुराना है लोहड़ी का इतिहास, जानिये क्या है परंपरा?

हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्रों खासकर कांगड़ा घाटी व पंजाब में लोहड़ी का पर्व बड़े उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। कांगड़ा घाटी में लोहड़ी की धूम है। इस त्यौहार को अपने-अपने रीति रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर सुंदरिये मुंदरिये हो दूल्हा भट्ठी वाला हो, जैसे पांरपरिक गीत को घर-घर सुनाकर बच्चे लोहड़ी मांगने के साथ-साथ मकर सक्रांति का संदेश भी देते हैं।

बच्चे टोलियों नाचते गाते झूमते घर-घर जाकर ऋतु परिवर्तन का संदेश देते हैं। गलियों बाजारों में अलग नजारा देखने को मिलता है। लोहड़ी के त्यौहार पर लोहड़ी गीतों का विशिष्ट महत्त्व रहता है। इसके बिना लोहड़ी आधी-अधूरी मानी जाती है। यह लोक गीत हमारी परंपरा की अमिट पहचान हैं। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के गीत अधिक मार्मिक और हृदयस्पर्शी होते हैं। मकर सक्रांति की पूर्व संध्या पर अतीत से ही लोहड़ी मनाने की परंपरा जहां पूरे देश और प्रदेश में प्रचलित है। वहीं पर कांगड़ा जिला के धरोहर गांव परागपुर में मनाया जाने वाला लोहड़ी पर्व की समूचे उत्तरी भारत में अलग पहचान है।

कांगड़ा जिले के परागपुर धरोहर गांव का इतिहास 550 वर्ष पुराना है, जिसका नामकरण तत्कालीन जसवां रियासत की राजकुमारी पराग के नाम पर किया गया था। इस धरोहर गांव की गणना पर्यटन जगत के विख्यात धरोहर गंतव्य स्थलों में की जाती है। जहां देश के इस प्राचीनतम गांव को दोने के लिए हर वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। परागपुर की लोहड़ी कालांतर से बड़े परंपरागत ढंग से मनाई जाती है। इस दिन सभी लोग एक जगह एकत्रित होकर लकड़ियां जलाकर उसके चारों ओर बैठकर खुशी के तराने गुनगुनाते हैं। इसके साथ ही सुख समृद्धि और खुशहाली के लिए तिल-चैली बनाना, तिल-अलसी, शक्कर मिश्रित लड्डू बनाना, मक्की के दाने उबालना प्रसिद्ध है।

अग्नि पूजा का लोहड़ी में विशेष महत्व रहता है। अग्नि में लोहड़ी पर बने अनेक पकवान भेंट कर उसे प्रसन्न करके ही बांटने-खाने की परंपरा है। इसके साथ ही दूल्हा भट्ठी की कहानी का भी बखान करते हैं। परागपुर की लोहड़ी के प्राचीन महत्व को मध्येनजर रखते हुए प्रदेश सरकार द्वारा इसे राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्रदान किया गया है, ताकि मेले में सांस्कृतिक इत्यादि गतिविधियों को शामिल करके और आकर्षक बनाया जा सके। लोहड़ी का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व है। स्थानीय भाषा में यह कहावत काफी प्रसिद्ध है कि आई लोहड़ी गया शीत कोढ़ी अर्थात लोहड़ी आने से शीत का प्रकोप कम हो जाता है। इसे खिचड़ी का त्यौहार के रूप में भी जाना जाता है। इस पर्व को दक्षिण भारत में पोंगल, पश्चिम बंगाल में मकर सक्रांति और असम में बिहू के नाम से मनाया जाता है।

भारतीय ज्योतिष विज्ञान में 12 राशियां मानी गयी हैं एवं प्रत्येक राशि में प्रत्येक माह में संक्रमण होता है। ज्योतिष में मकर राशि का स्वामी शनि व प्रतीक चिन्ह मकर को माना गया है। हिन्दू धर्म तथा संस्कृति में मकर एक पवित्र जीव है।

मकर संक्रांति पर शुभकामना सन्देश

मकर संक्रांति पर शुभकामना सन्देश

पंजाबी हिन्दुओं का प्रमुख्य त्योहार लोहरी

लोहडी : सिख समुदाय का महत्वपूर्ण त्योहार

लोहड़ी सिख परिवारों के लिए महत्वपूर्ण त्योहार हैं। लोहड़ी मकर संक्रांति के एक दिन पहले मनाया जाता है। हर साल 13 जनवरी को पंजाबी परिवारों में विशेष उत्साह होता है। यह उत्साह तब और बढ़ जाता है | पंजाबी हिन्दुओं का प्रमुख्य त्योहार लोहरी है, पंजाबी समुदाय के लोग लोहरी बड़े श्रद्धा और धूमधाम से मनाते है। हिन्दू धर्म के लोग नए साल की शुरुवात लोहरी मकर संक्रांति पर्व से ही करते है। लोहरी का पर्व हर पंजाबी के लिए खास होता है लेकिन यह त्योहार उन परिवारो के लिए बेहद खास होता है जिनके परिवार में नयी शादी या बच्चे का जन्म हुआ हो। लोहरी का त्यौहार उमंग और उत्साह का प्रतीक है।

लोहड़ी पर लड़कियों को उपहार

लोहड़ी के मौके पर कन्या के मायके से लड़की की मां कपड़े, मिठाईयां, गजक, रेवड़ी अपनी बेटी के लिए भेजती है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

माना जाता है कि जब दक्ष प्रजापति ने अपने दामाद भगवान शिव का अपमान किया और पुत्री सती का निरादर किया तो क्रोधित सती ने आत्मदाह कर लिया।

इसके बाद दक्ष को इसका बड़ा दंड भुगतना पड़ा। दक्ष की गलती को सुधारने के लिए ही माताएं लोहड़ी के मौके पर पुत्री को उपहार देकर दक्ष द्वारा किए अपराध का प्रायश्चित करती हैं।

इस अवसर पर लोग सारे देश में किसी न किसी रूप में अपने उमंग और उत्साह को प्रदर्शित करते हैं।
इसी प्रदर्शन को पर्व का रूप देकर अलग अलग भागों में भिन्न -भिन्न नामों से मनाया जाता । मकड़ संक्रांति के पूर्व संध्या पर मनाया जाने वाला यह उत्सव पंजाब का प्रमुख पर्व लोहरी के रूप में मनाया जाता है। दक्षिण भारत में यह पर्व पौंगल के रूप में मनाया जाता है।

खास कर जिसके घर में नवविवाहित जोड़े होते हैं उनके घर की ख़ुशी तो और भी कई गुना बढ़ जाती है। क्योंकि यह प्रथा इस पर्व के महत्व से जुड़ा हुआ है।
बच्चे इस अवसर पर कंड्डे और लकड़ी जमा करते हैं ,जिनके घर में नई नई शादी होती है बच्चे उनके घरों से पैसे आदि लेकर मूंगफली ,गज्जक ,गुर पट्टी आदि खरीदते हैं। आग के अलाव जलाकर उसके चारों ओर भांगड़ा करते हैं। जलती हुई आग में तिल गुड और मूंगफली आदि का भोग लगाते हैं और उपस्थित लोगों को भी मूंगफली ,रेवड़ी आदि बांटते हैं।

मकर संक्रांति पर शुभकामना सन्देश

मकर संक्रांति पर शुभकामना सन्देश

लोहड़ी की कथा और इतिहास

कहा जाता है की सुंदरी और मुनरी नाम की दो बहनें थी। बचपन में ही उनके माता -पिता का स्वर्गवास हो गया था। जवान होने पर उनके चाचा उन्हें किसी राजा के इसकी जानकारी दुल्ला भट्टी नामक एक डाकू को हुआ। दुल्ला भट्टी ने जालिमों से इन बच्चियों को बचाकर जंगल में लाया और उनके पिता बनकर उनका विवाह योग्य वर से वहीं आग जलाकर के सात फेरे करवाये। चुकि शादी जल्दी में हुई ,दुल्ला को उस समय देने के लिए कुछ भी नही था अतः लड़कियों के आँचल में एक एक सेर गुड डालकर विदा किया। तबसे लोहरी को त्यौहार, उत्सव इस के रूप में मनाने की प्रथा चली आ रही है। जिसे पुरे देश में हर्षोलास के साथ मनाया जाता है।
सुंदर, मुंदरिये हो,
तेरा कौन विचारा हो,
दुल्ला भट्टी वाला हो,
दुल्ले धी (लडकी)व्याही हो,
सेर शक्कर पाई हो।

long weekend

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