आमेर का किला और ऐतिहासिक महत्व

आमेर का किला

आमेर का किला : Rajasthan Tour Packages

आमेर का किला और ऐतिहासिक महत्व

जयपुर, जिसे गुलाबी नगर के नाम से भी जाना जाता है, जिसे भारत का पेरिस कहा जाता है | जयपुर राजस्थान की राजधानी भी है। आमेर के तौर पर यह जयपुर नाम से प्रसिद्ध प्राचीन रजवाड़े की भी राजधानी रहा है। इस शहर की स्थापना १७२८ में आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने की थी। इसपर कछवाहा समुदाय के राजपूत शासकों का शासन था। जयपुर अपनी समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा, सरस-संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। जयपुर से ११ किलोमीटर दूर ,कभी सात शताव्दियों तक ढूंडार के पुराने राज्य के कच्छवाहा शासकों की राजधानी आमेर ही थी | यह शहर तीन ओर से अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है। जयपुर शहर की पहचान यहाँ के महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी धौलपुरी पत्थरों से होती है जो यहाँ के स्थापत्य की खूबी है।

राजा मानिंसह

राजा मानिंसह: –               Jodhpur Jaisalmer Tour Package

आमेर का किला के संस्थापक -:

अब इस में  इतिहासकारो का भिन्न भिन्न मत मिलता आमेर ‘मीणा जाति के सूसावत राजवंश'[967Ad-1037Ad].में देवी अम्बा की श्रद्धा में बनवाया गया था. आमेर महल की नींव कांकलदेव के समय से जोड़ी गई है जबकि महल में रखे शिलालेख में इसे मानसिंह प्रथम द्वारा बनाया गया बताया है. जो तथ्य मुझे मिले हैं उन में भी यही है कि राजा मान सिंह [प्रथम ] ने पुराने भवन ‘आम्बेर”के अवशेषों पर ही इस दुर्ग का निर्माण सन् १५९२ में शुरू करवाया था. कछवाहा वंश का शासन १२ से १८ सदी तक रहा.

आमेर का किला और ऐतिहासिक महत्व

आमेर का किला और ऐतिहासिक महत्व:                     Udaipur Mount Abu Package

आमेर का किला और ऐतिहासिक महत्व

जयपुर, जिसे गुलाबी नगर के नाम से भी जाना जाता है, जिसे भारत का पेरिस कहा जाता है | जयपुर राजस्थान की राजधानी भी है। आमेर के तौर पर यह जयपुर नाम से प्रसिद्ध प्राचीन रजवाड़े की भी राजधानी रहा है। इस शहर की स्थापना १७२८ में आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने की थी। इसपर कछवाहा समुदाय के राजपूत शासकों का शासन था। जयपुर अपनी समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा, सरस-संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। जयपुर से ११ किलोमीटर दूर ,कभी सात शताव्दियों तक ढूंडार के पुराने राज्य के कच्छवाहा शासकों की राजधानी आमेर ही थी | यह शहर तीन ओर से अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है। जयपुर शहर की पहचान यहाँ के महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी धौलपुरी पत्थरों से होती है जो यहाँ के स्थापत्य की खूबी है।

गुलाबी शहर का उपनगर आमेर में स्थित है आमेर का किला। जो मुगलों और हिन्दूओं के वास्तुशिल्प का मिलाजुला और अद्वितीय नमूना है। जयपुर से 11 किलोमीटर दूर आमेर में स्थित आमेर के किले का निर्माण 16वीं शताब्दी में राजा मानिंसह ने करवाया था। हिंदू ओर मुगल आर्टिकेट का बेजोड़ नमूने इस किले को राजपूत राजा 16वीं शताब्दी से 1727 तक प्रयोग करते थे। अपने किले, मंदिर, महलों के अलावा यह अपने बाग के लिए भी बहुत मशहूर है।

जयपुर के पहले से पहले कछवाहा(मौर्य) राजवंश की राजधानी आमेर ही थी। राजा मानसिंह जी ने इस किले का निर्माण कार्य सन 1592 में आरंभ किया था। पहाड़ी पर बना यह महल टेढ़े मेढ़े रास्तों और दीवारों से पटा पड़ा है। महल में जय मंदिर, शीश महल, सुख निवास, और गणेश पोल देखने और घूमने के अच्छे स्थान हैं। इन्हें समय-समय पर राजा मानसिंह ने दो सदी के शसन काल के दौरान बनवाया था। आमेर का पुराना नगर महल के पास नीचे की ओर बसा था। यहाँ का जगत शिरोमणि मंदिर, नरसिंह मंदिर देखने योग्य हैं। आमेर का किला, कला का एक सुंदर नमूना भी है। यहाँ पर बहुत सी फिल्मों की शूटिंग भी होती है।

आम्बेर का किला अपने शीश महल के कारण भी प्रसिद्ध है। इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है। इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है। सुख महल व किले के बाहर झील बाग का स्थापत्य अपूर्व है।

पत्थर के मेहराबों की काट-छाँट देखते ही बनती है। यहाँ का विशेष आकर्षण है डोली महल, जिसका आकार उस डोली (पालकी) की तरह है, जिनमें प्राचीन काल में राजपूती महिलाएँ आया-जाया करती थीं। इन्हीं महलों में प्रवेश द्वार के अन्दर डोली महल से पूर्व एक भूल-भूलैया है, जहाँ राजे-महाराजे अपनी रानियों और पट्टरानियों के साथ आँख-मिचौनी का खेल खेला करते थे। कहते हैं महाराजा मान सिंह की कई रानियाँ थीं और जब राजा मान सिंह युद्ध से वापस लौटकर आते थे तो यह स्थिति होती थी कि वह किस रानी को सबसे पहले मिलने जाएँ। इसलिए जब भी कोई ऐसा मौका आता था तो राजा मान सिंह इस भूल-भूलैया में इधर-उधर घूमते थे और जो रानी सबसे पहले ढूँढ़ लेती थी उसे ही प्रथम मिलन का सुख प्राप्त होता था।

मुख्य द्वार गणेश पोल कहलाता है, जिसकी नक्काशी अत्यन्त आकर्षक है। यहाँ की दीवारों पर कलात्मक चित्र बनाए गए थे और कहते हैं कि उन महान कारीगरों की कला से मुगल बादशाह जहांगीर इतना नाराज़ हो गया कि उसने इन चित्रों पर प्लास्टर करवा दिया। ये चित्र धीरे-धीरे प्लास्टर उखड़ने से अब दिखाई देने लगे हैं। आमेर में ही है चालीस खम्बों वाला वह शीश महल, जहाँ माचिस की तीली जलाने पर सारे महल में दीपावलियाँ आलोकित हो उठती है। हाथी की सवारी यहाँ के विशेष आकर्षण है, जो देशी सैलानियों से अधिक विदेशी पर्यटकों के लिए कौतूहल और आनंद का विषय है।

कुछ ऐतिहासिक तथ्य जानिए- :

महाराजा मान सिंह [१५८९-१६१४]-बादशाह अकबर कि सेना में मुख्य सेनापति और अकबर के दायें हाथ माने जाते थे.यह अकबर के दरबार में नौ रत्नों में से एक थे. राजा मान सिंह के पिता भगवंत दस ने रन्थम्बोर की लड़ाई [१५६९ AD] में अकबर का बहुत सहयोग दिया था . राजा मान सिंह को अकबर अपना बेटा मानते थे ,उन्हें अपनी सेना में प्रशिक्षण भी अकबर ने ही दिलाया था और इसी वजह से भी जहाँगीर[सलीम] में एक दूरी रही. राजा मान सिंह ने ही हल्दी घाटी के युद्ध[१५७६ AD] में महाराणा प्रताप के विरुद्ध अकबर की सेना की कमान संभाली हुई थी. इनके बेटे जगत सिंह की असामयिक मृत्यु पर रानी कनकवती ने आमेर की पहाडी के नीचे उन की याद में सुंदर कृष्ण मन्दिर बनवाया था.  इस आम्बेर के किले को को राजा मान सिंह के बेटे जगत सिंह के पोते ‘मिर्जा ‘राजा जय सिंह [प्रथम ] .[१६२२ -१६६७ AD ] ने आगे बनवाया.यह राजा शाहजहाँ की ४००० सैनिकों वाली सेना की कमान संभालते थे.

इन्हीं राजा जय सिंह प्रथम के पोते राजा सवाई जय सिंह [द्वितीय ] [१६६६-१७४३]ने इस दुर्ग को पूरा किया.वर्तमान स्वरूप में निखारा और संरक्षण में अपनी मुख्य भुमिका दी. कहते हैं यह मूल रूप में विशाल किले जयगढ़ का ही एक हिस्सा था. यह दुर्ग राजपूती स्टाइल में बनाना शुरू हुआ मगर इस पर मुग़ल शैली का प्रभाव देखा जा सकता है.  इस महल का ‘दीवाने ख़ास ‘और मुख्य द्वार गणेश पोल है, जिन की नक्काशी अत्यन्त आकर्षक है,[कहते हैं ] कि ईर्ष्या वश मुगल बादशाह जहांगीर इतना नाराज़ हो गया कि उसने इन चित्रों पर प्लास्टर करवा दिया. ये चित्र  धीरे-धीरे प्लास्टर उखड़ने से अब दिखाई देने लगे हैं .गाईड ने हमें वे चित्र भी दिखाए. जय मन्दिर यानि-‘शीश महल ‘ मिर्जा राजा जय सिंह [प्रथम ]ने बनवाया था. if you find more details about Rajasthan Heritage Tour please click this links

Night Tour of Amber Fort in Jaipur

Night Tour of Amber Fort in Jaipur : Rajasthan Desert Tour

रात में चमकता किला

आमेर के महलों के पीछे दिखाई देता है नाहरगढ़ का ऐतिहासिक किला, जहाँ राजा मान सिंह की अरबों रुपए की सम्पत्ति ज़मीन में गड़ी होने की संभावना और आशंका व्यक्त की जाती है.  ऐसा सुना गया है कि आमेर विकास एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार,आमेर महल के पहाड़ी रास्तों से जयगढ़ किले को जोड़ने वाले एक किलोमीटर लंबे गुप्त मार्ग का जीर्णोद्धार (रिनोवेशन) कर के खोला जाएगा,इसे कभी महल का सबसे गोपनीय रास्ता माना जाता था. यह गुप्त मार्ग आमेर महल में पीछे के हिस्से में जनानी ड्योढ़ी के नजदीक से रंगमहल होकर गुजरता है। महल से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि यह मार्ग इतना बड़ा है कि एकसाथ 8 आदमी आसानी से इसमें से गुजर सकते हैं।आमेर महल से जयगढ़ वाया ‘सुरंग’ जुड़ने पर शहर के सभी प्रमुख महलों और किलों को जोड़ने वाला यह पहला सर्किट बनेगा.

Night Tour of Amber Fort in Jaipur

Night Tour of Amber Fort in Jaipur: if you find more information Click here about Rajasthan Cultural Tour in India

किले के बारे में-

आमेर पहाडी पर स्थित यह किला संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर से निर्मित आमेर फोर्ट अपनी भव्यता और विशालता के लिए प्रसिद्ध है। यह हिन्दू और मुस्लिम निर्माण शैली का बेहतर नमूना है। यह महलों, मंडपों, बगीचों और मंदिरों का एक आकर्षक भवन है।

दुर्ग के सामने ‘मावठा झील ‘के शान्त पानी में महल की परछाईं देखें. यह किला चार विभागों में बना हुआ है. सिंहपोल और जलेब चौक तक अकसर पर्यटक हाथी पर सवार होकर जाते हैं। चौक के सिरे से सीढ़ियों की पंक्तियाँ उठती हैं, एक शीला माता के मंदिर की ओर जाती है और दूसरी महल के भवन की ओर।

यहां स्थापित करने के लिए राजा मान सिंह द्वारा संरक्षक देवी की मूर्ति, जिसकी पूजा हजारों श्रद्धालु करते है, पूर्वी बंगाल (जो अब बंगला देश है) के जेसोर से यहां लाई गई थी। आज भी इस मन्दिर में बंगाल के पुजारी ही देख रेख करते हैं .एक दर्शनीय खंभो वाला हॉल दीवान-ए-आम और एक दोमंजिला चित्रित प्रवेशद्वार, गणेश पोल आगे के पंरागण में है।

किले की एक खिड़की से दृश्य

किले की एक खिड़की से दृश्य : Rajasthan Wildlife Tour

किले की एक खिड़की से दृश्य

गलियारे के पीछे चारबाग की तरह का एक रमणीय छोटा बगीचा है जिसकी दाई तरफ सुख निवास है और बाई तरफ जसमंदिर। इसमें मुगल व राजपूत वास्तुकला का मिश्रित है, बारीक ढंग से नक्काशी की हुई जाली की चिलमन, बारीक शीशों और पच्चीकारी का कार्य और चित्रित व नक्काशीदार निचली दीवारें।काँच और संगमरमर में जड़ा अनुपम सौंदर्य–पत्थर के मेहराबों की काट-छाँट देखते ही बनती है।

आमेर का किला अपने शीश महल के कारण भी प्रसिद्ध है। इसकी भीतरी दीवारों ,गुम्बदों और छतों पर मोजैक पनेलों में रंगीन कांच ,संगमरमर और शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है। सुख महल में चंदन के दरवाजे पर हाथी दांत की कारीगरी अद्भुत है,हवा के आने की ऐसी व्यवस्था है कि गर्मियां में ठंडी हवा आती रहती है.किले के बाहर झील बाग का स्थापत्य बेहद सुंदर है।

एक और आकर्षण है -‘डोली महल’- जिसका आकार उस डोली (पालकी) की तरह है, जिनमें रानियाँ आया-जाया करती थीं। इन्हीं महलों में प्रवेश द्वार के अन्दर डोली महल से पूर्व एक भूल-भूलैया है, जहाँ राजे-महाराजे अपनी रानियों और पट्टरानियों के साथ आँख-मिचौनी का खेल खेला करते थे.[शायद इस लिए भी इसे रूमानी जगह कहते हैं!]बहुत इच्छा थी  इसे देखने कि परंतु मैं नहीं देख पाई .

महाराजा मान सिंह की कई रानियाँ थीं-जब युद्ध से वापस लौटकर आते थे तो यह स्थिति होती थी कि वह किस रानी को सबसे पहले मिलने जाएँ। इसलिए जब भी कोई ऐसा मौका आता था तो राजा मान सिंह इस भूल-भूलैया में इधर-उधर घूमते थे और जो रानी सबसे पहले ढूँढ़ लेती थी महा राजा मानसिंह सबसे पहले उसी रानी के कक्ष मे विश्राम के लिये जाते थे, मावठा झील के मध्य में सही अनुपातित मोहन बाड़ी या केसर क्यारी और उसके पूर्वी किनारे पर दिलराम बाग ऊपर बने महलों का मनोहर दृश्य दिखाते है। आमेर महल विश्व पर्यटन मानचित्र पर विशेष महत्व तो रखता ही है, यहां शीला माता [माँ काली]का मंदिर भी लाखों लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है.

कैसे पहुंचें--

कैसे पहुंचें– if your find best option about Rajasthan Honeymoon Tour

कैसे पहुंचें–

दिल्ली से जयपुर वायु,सड़क के रास्ते भी पहुँच सकतेहैं, जयपुर में ऑटोरिक्शा या बस से सीधा आमेर की किले तक जाने की सुविधा है | अक्टूबर से फरवरी यहाँ घूमने के लिए सब से अच्छा मौसम है | खुलने का समय-सुबह ९ से शाम ४:३० तक | प्रवेश शुल्क के साथ अगर कैमरा या विडियो कैमरा है तो उनके लिए भी शुल्क लेना होगा |  सम्बन्धित अन्य जानकारियाँ आप हमारी वेबसाईट http://www.swantour.com   या सम्बन्धित विभाग में फोन द्वारा पूछ कर भी ले सकते हैं  अगर आप को राजस्थान की यात्रा का पैकेजेस बुक करनी है तो आप हमारी साइट पैर विजिट कर सकते है | swan tours is a best tour and travel organization in India they are provides all holiday packages in India at lowest prices

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s